अनूपपुर: गणेश पुराण में उल्लेख : माता पार्वती के श्राप से मुक्ति दिलाने वाला व्रत बना गणेश चतुर्थी

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अनूपपुर: गणेश पुराण में उल्लेख : माता पार्वती के श्राप से मुक्ति दिलाने वाला व्रत बना गणेश चतुर्थी


अनूपपुर: गणेश पुराण में उल्लेख : माता पार्वती के श्राप से मुक्ति दिलाने वाला व्रत बना गणेश चतुर्थी


अनूपपुर, 14 सितंबर (हि.स.)। आज पूरे देश सहित मध्य प्रदेश के अनूपपुर जिले में गणेश चतुर्थी का व्रत एवं पर्व धूमधाम से मनाया जा रहा है। इसकी धार्मिक तथा पौराणिक कथा के अनुसार यह अमरकंटक से ही प्रारंभ हुई थी। पवित्र नगरी अमरकंटक प्रभु भोलेनाथ का स्थान है, जहां अमरकठेश्वर महादेव, जलेश्वर महादेव मंदिर हैं। यहां प्रतिवर्ष हजारों लाखों श्रद्धालु दर्शन करने के लिए पहुंचते हैं।

मां नर्मदा भगवान भोलेनाथ की पुत्री मॉ नर्मदा का उद्गम स्थल अमरकंटक है। ऐसे में गणेश चतुर्थी की पूजा भी यहीं से प्रारंभ हुई। इसका वर्णन गणेश पुराण में मिलता है। बताया जाता है कि चौसर खेल में गलत निर्णय से आक्रोशित होकर माता ने कार्तिकेय को श्राप दिया था। इसके बाद गणेश चतुर्थी के व्रत से मुक्ति मिली थी।

मां नर्मदा मंदिर के प्रधान पुजारी पं. धनेश द्विवेदी वंदे महाराज ने बताया कि एक बार मैकल पर्वत पर भगवान भोलेनाथ और माता पार्वती रंग महल में चौसर का खेल खेल रहे थे और इस दौरान पुत्र कार्तिकेय को खेल में कौन जीता कौन हारा इसका निर्णय करने के लिए दोनों ने कहा। खेल खेलते हुए काफी समय बीत गया और इस खेल में तीन बार माता पार्वती जीत गई। इस दौरान बालक कार्तिकेय को नींद आ गई। खेल समाप्ति के बाद माता पार्वती ने उनसे पूछा कि कौन खेल में जीता और अचानक उन्होंने भोलेनाथ का नाम बताया।

जिससे आक्रोशित होकर माता ने कार्तिकेय को सब कुछ भूल जाने का श्राप दे दिया। इसके बाद कार्तिकेय की भूल पर क्षमा मांगने पर माता ने उन्हें कहा था कि इसी स्थल में 5 नाग कन्याएं गणेश चतुर्थी का व्रत कर पूजन करने आएंगी और उनसे व्रत की जानकारी लेकर 21 दिनों तक इस व्रत और पूजा को करने के बाद श्राप मुक्त हो जाएंगे तथा कैलाश पर्वत आने का रास्ता भी उन्हें याद आ जाएगा। माता के बताए अनुसार नाग कन्याओं के आने पर कार्तिकेय ने व्रत की जानकारी लेकर 21 दिनों तक गणेश चतुर्थी का व्रत रखकर पूजन किया और प्रभाव से श्राप से मुक्त हो गए। इसके बाद कैलाश पर्वत तक आने का रास्ता उन्हें याद आ गया और पहुंचे।

भोलेनाथ ने भी किया 21 दिनों का व्रत

जब कार्तिकेय व्रत पूरा कर कैलाश पर्वत पहुंचे तो भगवान भोलेनाथ ने उन्हें श्राप से मुक्ति कैसे मिली इसकी जानकारी ली। तब कार्तिकेय ने भगवान भोलेनाथ को व्रत के नियम एवं पालन की जानकारी दी और भगवान भोलेनाथ ने भी 21 दिनों तक यह व्रत किया। जिसके प्रभाव से माता पार्वती का क्रोध शांत हुआ और भगवान भोलेनाथ और माता का मिलन हुआ।

नर्मदा मंदिर के मुय पुजारी पं. धनेश द्विवेदी वंदे महराज ने बताया कि मैंकल पर्वत की रक्षा के लिए अमरकंटक के 8 दिशाओं में भगवान गणेश की स्वयंभू प्रतिमाएं स्थापित है जो कि घने जंगलों के बीच दुर्गम पहाड़ियों में स्थित है। जिनमें धरहर गणेश, सिध्दी विनायक, परसू विनायक, बुद्धि विनायक, श्वेत विनायक, बिल्व विनायक, मैकल गणेश, ढुंढीकर्ण, चंद्र विनायक की स्वयंभू प्रतिमा यहां स्थापित है। उन्होंने बताया कि धरहर गणेश मंदिर में ही आने जाने का रास्ता है और यहां श्रद्धालु पहुंचकर पूजा अर्चना करते हैं अन्य 7 भगवान गणेश की स्वयंभू प्रतिमा दुर्गम घने जंगलों के बीच स्थित होकर मैकल पर्वत की रक्षा कर रही है।

हिन्दुस्थान समाचार / राजेश शुक्ला

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