एमसीयू में स्मृति व्याख्यान : बाबा साहब मानते थे कि समरसता के बिना स्वतंत्रता अधूरी है : डॉ. प्रकाश बरतूनिया

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एमसीयू में स्मृति व्याख्यान : बाबा साहब मानते थे कि समरसता के बिना स्वतंत्रता अधूरी है : डॉ. प्रकाश बरतूनिया


भोपाल, 15 अप्रैल (हि.स.)। बाबा साहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर कई भाषाओं के जानकार थे। संविधान निर्माता की उनकी पहचान लोकप्रिय है लेकिन वे कुशल अध्येता, लेखक, पत्रकार, संपादक, वकील, प्रोफेसर, अर्थशास्त्री, राजनीतिज्ञ और समाज सुधारक, सब एक साथ थे। शिक्षा को लेकर एक संकल्प, ललक और जिद थीं उनके भीतर। हर क्षेत्र में वे इतने माहिर थे कि लगता था यही उनकी प्रिय विधा है। यह विचार प्रखर वक्ता डॉ. प्रकाश बरतुनिया ने व्यक्त किए। वे बुधवार को एमसीयू में आयोजित बाबा साहेब के स्मृति व्याख्यान के अवसर पर बोल रहे थे।

बाबा साहेब के बहुआयामी व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता, समता और बंधुत्व के वे प्रबल पक्षधर थे। 64 साल के कार्यकाल में उन्होंने 38 डिग्रियां हासिल की। उनके 527 भाषणों से उनके संचार कौशल का अनुमान लगाया जा सकता है। वे मानते थे कि समरसता के बिना स्वतंत्रता अधूरी है। संविधान निर्माण में उन्होंने इस बात का पूरा ध्यान रखा कि भारतीय संस्कृति का क्षरण न हो। धर्म को वे नैतिक आचरण का माध्यम मानते थे। स्वयं 9 भाषाओं के जानकार थे। संस्कृत को वे राष्ट्रभाषा बनाने के हिमायती थे और जब संस्कृत पर सहमति नहीं बनी तो हिंदी के लिए उन्होंने आवाज़ उठाई थीं। डॉ. बरतूनिया ने कहा कि उनकी आरक्षण सम्बन्धी अवधारणा को भी अलग रूप में समझा गया। उनके लिखे साहित्य के माध्यम से हमें पहले उनके विचार और धारणा को जानना चाहिए।

आयोजन की अध्यक्षता कर रहे कुलगुरु विजय मनोहर तिवारी ने कहा कि प्रति वर्ष उनकी स्मृति में किए गए आयोजन पर बाबा साहेब के विशेष पक्ष को समझने का प्रयास होना चाहिए। भाषा और संस्कृति के प्रति उनका समर्पण प्रशंसनीय है। वे संस्कृत इसलिए पढ़ना चाहते थे कि इस देश का सर्वोत्कृष्ट साहित्य उसी में रचा हुआ है। डॉ. अम्बेडकर के पिताजी ज्योतिष के विद्वान थे। मूल नक्षत्र में पैदा होने के कारण उनके अपने ही घर में उनको तिरस्कार का सामना करना पड़ा। उनकी चाची ने पालन पोषण किया।

भारत की व्यवस्था को समझने के लिए कुलगुरु ने मेगस्थनीज की डायरी पढ़ने का आह्वान किया, जिसमें समाज को 7 श्रेणियों में विभाजित किया गया था। पहली श्रेणी शिक्षाविदों की दूसरी किसानों की और तीसरी शिल्पी की थीं। उन्होंने आगे बताया कि राजनेताओं को श्रेणी सातवें स्थान पर रखा गया।

उन्होंने साहित्यकार अमृतलाल नागर की 'नाच्यो बहुत गोपाल, पढ़ने पर भी जोर दिया। नागर कट्टर ब्राह्मण होने पर भी उपन्यास लिखने तक उन निचली गरीब बस्तियों में रहे। उस किताब से आप जान सकते हैं कि हम पर अस्पर्शता की परम्परा किसने और कब थोपी है। उन्होंने भारत विभाजन पर बाबा साहेब की कृति पढ़ने का भी अनुरोध किया।

अंत में कुलसचिव डॉ पी. शशिकला ने अपने उद्बोधन में कहा कि बाबा साहेब ने महिला शिक्षा पर जोर देते हुए कहा था कि यही एकमात्र हथियार है। समाज की विषमताओं से लड़ने का। अम्बेडकर जी ने कामकाजी महिलाओं के मातृत्व अवकाश की भी बात कही थी। कार्यक्रम के आरंभ में अतिथियों ने बाबा साहेब के समक्ष दीप प्रज्वलन किया। संचालन विश्वविद्यालय के अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति प्रकोष्ठ के संयोजक डॉ. गजेंद्र सिंह अवास्या ने किया। विश्वविद्यालय के लता मंगेशकर सभागार में आयोजित इस कार्यक्रम में सभी विभागों के विभागाध्यक्ष, प्राध्यापक, अधिकारी, कर्मचारी और विद्यार्थी उपस्थित थे।

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हिन्दुस्थान समाचार / राजू विश्वकर्मा

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