अनूपपुर: अमरकंटक के जमुना दादार, रुद्र गंगा भीषण आग, 50 हेक्टेयर क्षेत्र में 27,500 औषधीय पौधे जलकर राख

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अनूपपुर: अमरकंटक के जमुना दादार, रुद्र गंगा भीषण आग, 50 हेक्टेयर क्षेत्र में 27,500 औषधीय पौधे जलकर राख


अनूपपुर: अमरकंटक के जमुना दादार, रुद्र गंगा भीषण आग, 50 हेक्टेयर क्षेत्र में 27,500 औषधीय पौधे जलकर राख


अनूपपुर, 22 अप्रैल (हि.स.)। मध्य प्रदेश के अनूपपुर जिले के अमरकंटक के जमुना दादार नवोदय विद्लय क्षेत्र के वन में बुधवार की सुबह अचानक आग भड़क उठी, जिसने देखते ही देखते विकराल रूप धारण कर लिया।

आग की लपटें तेज हवाओं के साथ फैलती हुई वन क्षेत्र के बड़े हिस्से को अपनी चपेट में ले लिया जिससे आसपास के पर्यावरण, वन्यजीवों एवं जनजीवन पर गंभीर संकट उत्पन्न हो गया था। नागरिकों ने अपने संसाधनो के माध्य्म से आग बूझाने का प्रयास किया और नप का दमकल एवं वन विभाग की टीम की मदद से काबू पाया गया। ज्ञात हो कि इसके एक दिवस पूर्व वार्ड क्रमांक चार एवं पांच के रुद्र गंगा वन क्षेत्र में आग लगी थी।

इससे अमरकंटक वन परिक्षेत्र में स्थित औषधीय वन में मंगलवार और बुधवार को आग लगने से करीब 50 हेक्टेयर क्षेत्र में फैले इस औषधीय वन में 27 हजार 500 से अधिक पौधे जलकर राख हो गए। जिस वन से औषधीय संरक्षण और जैव विविधता को मजबूत करने की उम्मीद थी, वही विभागीय लापरवाही का शिकार बन गया। इससे विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह आगजनी हादसा नहीं बल्कि अनदेखी का नतीजा है। हैरान करने वाली बात यह है कि इतने बड़े नुकसान पर वन विभाग अब तक चुप्पी साधे हुए है।

औषधीय वन में भीषण आग

जिले के वन परिक्षेत्र अमरकंटक में जहां 50 हेक्टेयर में विकसित औषधीय वन अचानक आग की चपेट में आ गया। आग इतनी तेज थी कि देखते ही देखते पूरे क्षेत्र में लगे औषधीय पौधे जलकर पूरी तरह नष्ट हो गए। इस वन में कुल 27,500 पौधे लगाए गए थे, जिनमें कई दुर्लभ और औषधीय दृष्टि से महत्वपूर्ण प्रजातियां शामिल थीं। वन विभाग में निचले स्त र पर तैनात कर्मचारी ने बताया कि मुझे अक्सर अलग-अलग क्षेत्रों में आग बुझाने के लिए भेज दिया जाता था, जिसके चलते इस औषधीय वन की नियमित निगरानी प्रभावित होती रही। वर्ष 2021-22 में पौधारोपण किए जाने के बाद से अब तक इन औषधीय पौधों में कभी खाद नहीं डाली गई। न ही कीटनाशक दवाइयों का कोई प्रयोग किया गया। सबसे गंभीर बात यह है कि पिछले करीब एक वर्ष से इस पूरे क्षेत्र में झाड़-झंखाड़ और सूखी घास की सफाई भी नहीं कराई गई, यही सूखा कचरा आग के फैलने का सबसे बड़ा कारण बना। पौधों के बीच फैली सूखी घास और झाड़ियों ने आग को तेजी से फैलने में मदद की और पूरे क्षेत्र में आग बुझाने के लिए पर्याप्त इंतजाम हैं। जिससे कुछ ही समय में पूरा औषधीय वन आग में खाक हो गया और हजारों पौधे नष्ट हो गए।

इस घटना से कई सवालों खडे करती है कि आखिर करोड़ों रुपये की लागत से तैयार की गई योजनाओं की देखरेख इतनी ढीली क्यों है। अमरकंटक जैसे संवेदनशील और जैव विविधता से भरपूर क्षेत्र में इस तरह की लापरवाही कई बड़े पर्यावरणीय नुकसान की ओर इशारा करती है. बताया जा रहा है कि इस औषधीय वन के आसपास आबादी वाला क्षेत्र भी है, इसके बावजूद सुरक्षा और निगरानी के पुख्ता इंतजाम नहीं किए गए।

इतने बड़े नुकसान के बावजूद वन विभाग की ओर से अब तक कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। न यह स्पष्ट किया गया है कि आग कैसे लगी, और न ही यह कि इस नुकसान की जिम्मेदारी किसकी है। स्थानीय लोगों का कहना है कि अक्सर कागजी कार्यवाही में व्यस्त रहने वाला विभाग मौके पर आवश्यक रखरखाव नहीं कर पाया। जो औषधीय पौधों का यह वन न सिर्फ पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से अहम था, बल्कि इसका उद्देश्य पारंपरिक औषधीय ज्ञान और वन संसाधनों को संरक्षित करना भी था, एक ही आग ने वर्षों की मेहनत और संसाधनों को खत्म कर दिया।

अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच होगी और जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई की जाएगी या नहीं. पर्यावरण प्रेमियों और स्थानीय नागरिकों का कहना है कि अगर समय रहते जवाबदेही तय नहीं हुई, तो ऐसे हादसे दोबारा भी हो सकते हैं. फिलहाल यह औषधीय वन विभागीय लापरवाही की एउटा बड़ी मिसाल बन चुका है.

प्रशासन से त्वरित हस्तक्षेप की मांग करते हुए कहा है कि तत्काल दमकल दल एवं वन विभाग की टीम को सक्रिय कर आग पर शीघ्र नियंत्रण पाया जाए। साथ ही, भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने हेतु प्रभावी रणनीति एवं सतत निगरानी व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।

हिन्दुस्थान समाचार / राजेश शुक्ला

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