मैहर रेलवे गुड्स शेड में धूल के बीच काम करने को मजबूर मजदूर, सुरक्षा और प्रदूषण नियंत्रण पर उठे सवाल

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मैहर रेलवे गुड्स शेड में धूल के बीच काम करने को मजबूर मजदूर, सुरक्षा और प्रदूषण नियंत्रण पर उठे सवाल


मैहर, 27 अक्टूबर (हि.स.)। मध्य प्रदेश के मैहर स्थित रेलवे गुड्स शेड में सीमेंट और क्लिंकर की लोडिंग-अनलोडिंग में लगे करीब 150 से 200 मजदूरों की सुरक्षा और बुनियादी सुविधाओं को लेकर सवाल उठ रहे हैं। श्रमिकों को पर्याप्त सुरक्षा उपकरण, स्वच्छ पेयजल और विश्राम की समुचित सुविधाएं नहीं मिलने की शिकायतें सामने आई हैं। वहीं, माल की लोडिंग-अनलोडिंग के दौरान उड़ने वाली धूल से आसपास के रहवासियों को भी परेशानी होने का दावा किया जा रहा है।

मामले में मैहर एसडीएम दिव्या पटेल और क्षेत्रीय प्रदूषण अधिकारी के निरीक्षण की जानकारी सामने आने के बाद अब निरीक्षण में दर्ज कमियों और उन पर की गई कार्रवाई को लेकर सवाल उठ रहे हैं। स्थानीय स्तर पर मांग की जा रही है कि संबंधित विभाग स्थिति स्पष्ट करें और श्रमिकों की सुरक्षा के साथ प्रदूषण नियंत्रण के लिए ठोस कदम उठाएं।

सुरक्षा उपकरण और बुनियादी सुविधाओं पर सवाल

गुड्स शेड में काम करने वाले श्रमिकों की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सामने आई शिकायतों के अनुसार, कार्यस्थल पर मास्क, दस्ताने और सेफ्टी शूज जैसे व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरणों की उपलब्धता पर्याप्त नहीं होने के सवाल उठाए गए हैं। श्रमिकों के लिए बैठने और आराम करने की उचित व्यवस्था, भोजन के लिए निर्धारित स्थान, छायादार विश्राम स्थल तथा स्वच्छ पेयजल जैसी सुविधाओं को लेकर भी शिकायतें हैं।

श्रमिकों का कहना है कि खुले स्थान पर भोजन करने और पर्याप्त विश्राम की सुविधा नहीं होने से उन्हें कठिन परिस्थितियों में काम करना पड़ता है। ऐसे में संबंधित रेलवे अधिकारियों और कार्य संचालन करने वाली एजेंसियों को यह स्पष्ट करना चाहिए कि गुड्स शेड में वर्तमान में कौन-कौन सी सुविधाएं उपलब्ध हैं और किन व्यवस्थाओं में सुधार की आवश्यकता है।

रेलवे की गुड्स शेड विकास नीति में माल ढुलाई से संबंधित सुविधाओं के विकास पर जोर दिया जाता है। ऐसे में श्रमिकों के लिए सुरक्षित कार्यस्थल और आवश्यक बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है।

धूल प्रदूषण से आसपास के रहवासी परेशान

सीमेंट और क्लिंकर की लोडिंग-अनलोडिंग के दौरान उड़ने वाली धूल आसपास के रिहायशी इलाकों तक पहुंचने की शिकायतें भी सामने आई हैं। स्थानीय नागरिकों का दावा है कि धूल घरों में जमा हो जाती है और इससे आंखों में जलन तथा सांस लेने में परेशानी जैसी समस्याएं होती हैं। हालांकि, इन शिकायतों की पुष्टि के लिए प्रदूषण के स्तर का वैज्ञानिक आकलन और स्वतंत्र जांच आवश्यक है।

रेलवे बोर्ड ने 16 अप्रैल 2018 को रेलवे साइडिंग पर प्रदूषण नियंत्रण से संबंधित दिशा-निर्देश जारी किए थे। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के दिशा-निर्देशों में भी वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने के उपायों पर जोर दिया गया है।

स्थल की परिस्थितियों और लागू नियमों के अनुसार पक्की सड़क, पानी का छिड़काव, डस्ट स्क्रीन, हरित पट्टी विकसित करने तथा माल को ढककर रखने जैसे उपाय धूल के प्रसार को कम करने में सहायक हो सकते हैं। मैहर रेलवे गुड्स शेड में इनमें से कौन-कौन से उपाय लागू हैं और निर्धारित मानकों का कितना पालन किया जा रहा है, इसकी जानकारी संबंधित अनुमति-पत्रों, निरीक्षण रिपोर्ट और प्रदूषण नियंत्रण संबंधी अभिलेखों से स्पष्ट हो सकेगी।

निरीक्षण के बाद कार्रवाई की जानकारी सार्वजनिक करने की मांग

मामले में प्रमुख सवाल यह है कि एसडीएम और क्षेत्रीय प्रदूषण अधिकारी के निरीक्षण के दौरान किन कमियों को दर्ज किया गया था। क्या संबंधित एजेंसियों को सुधार के निर्देश दिए गए? यदि निर्देश जारी हुए, तो उनके पालन के लिए क्या समयसीमा निर्धारित की गई और क्या दोबारा निरीक्षण किया गया? इन सवालों के आधिकारिक जवाब सामने आना बाकी हैं।

स्थानीय स्तर पर मांग की जा रही है कि निरीक्षण रिपोर्ट और सुधारात्मक कार्रवाई की स्थिति सार्वजनिक की जाए। यदि जांच में नियमों के उल्लंघन या व्यवस्थागत कमियां सामने आई हैं, तो जिम्मेदार पक्षों की पहचान कर नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए। केवल निरीक्षण या नोटिस तक सीमित रहने के बजाय निर्धारित मानकों का पालन सुनिश्चित करना जरूरी है, ताकि श्रमिकों और आसपास के नागरिकों को वास्तविक राहत मिल सके।

श्रम विभाग की जिम्मेदारी भी अहम

कार्यस्थल पर श्रमिकों की सुरक्षा और बुनियादी सुविधाओं का मामला श्रम विभाग के अधिकार क्षेत्र से भी जुड़ा है। शिकायत है कि विभाग की ओर से पहले मजदूरों को शिकायत दर्ज कराने के लिए कहा गया था। हालांकि, इस कथित प्रतिक्रिया की आधिकारिक पुष्टि और विभाग का पक्ष सामने आना बाकी है।

दैनिक मजदूरी पर निर्भर श्रमिकों के लिए शिकायत दर्ज कराना कई बार कठिन हो सकता है। रोजगार पर असर पड़ने की आशंका के कारण भी वे अपनी समस्याएं खुलकर सामने रखने से बच सकते हैं। ऐसे में संबंधित विभाग को अपने अधिकार क्षेत्र और लागू श्रम कानूनों के तहत कार्यस्थल की परिस्थितियों की जांच करनी चाहिए।

इसके साथ ही संबंधित नियोक्ता, ठेकेदार और कार्य संचालन करने वाली एजेंसियों की जिम्मेदारियां स्पष्ट की जानी चाहिए। श्रमिकों को काम की प्रकृति और जोखिम के अनुरूप सुरक्षा उपकरण, सुरक्षित कार्यस्थल, स्वच्छ पेयजल और उचित विश्राम सुविधाएं उपलब्ध कराना आवश्यक है।

संयुक्त कार्रवाई से ही निकलेगा समाधान

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार और मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व वाली मध्य प्रदेश सरकार से आम जनता बेहतर प्रशासन, नियमों के प्रभावी पालन और जनसमस्याओं के समयबद्ध समाधान की अपेक्षा करती है। मैहर रेलवे गुड्स शेड का मामला भी प्रशासनिक जवाबदेही और संबंधित विभागों के बीच समन्वय की आवश्यकता को सामने लाता है।

हालांकि, बिना ठोस प्रमाण किसी अधिकारी या विभाग पर मिलीभगत अथवा जानबूझकर लापरवाही का आरोप लगाना उचित नहीं होगा। जरूरत इस बात की है कि शिकायतों की निष्पक्ष जांच हो, निरीक्षण में सामने आई कमियों का ब्योरा दिया जाए और सुधारात्मक कदमों की स्थिति स्पष्ट की जाए।

स्थानीय नागरिकों ने पश्चिम मध्य रेलवे के जबलपुर मंडल, मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, श्रम विभाग और जिला प्रशासन से संयुक्त कार्रवाई की मांग की है। अब देखना होगा कि संबंधित एजेंसियां श्रमिकों की सुरक्षा, बुनियादी सुविधाओं और धूल प्रदूषण से जुड़ी शिकायतों के समाधान के लिए क्या कदम उठाती हैं।

हिन्दुस्थान समाचार / हीरेन्‍द्र द्विवेदी

Livevns.news Desk
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