इंदौरः शहर की बिगड़ती यातायात व्यवस्था पर हाईकोर्ट ने जताई नाराजगी
इंदौर, 20 अप्रैल (हि.स.)। मध्य प्रदेश के इंदौर शहर की बिगड़ती यातायात व्यवस्था को लेकर दायर जनहित याचिकाओं पर सोमवार को हुई सुनवाई के दौरान उच्च न्यायालय ने नाराजगी जताई है।
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ में न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और आलोक अवस्थी की युगलपीठ ने जनहित याचिका पर सुनवाई की। इस दौरान कलेक्टर, निगम कमिश्नर और डीसीपी ट्रैफिक उपस्थित हुए। मामले में राजलक्ष्मी फाउंडेशन सहित अन्य संबद्ध याचिकाओं पर हुई सुनवाई में वरिष्ठ अधिवक्ता अजय बागडिया, शिरीन सिलावट ने पक्ष रखें। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने 14 अक्टूबर 2019 को पारित आदेशों के प्रभावी क्रियान्वयन न होने पर गंभीर चिंता व्यक्त की।
पूर्व आदेश में निर्देश दिए गए थे कि शहर में ट्रैफिक का निर्बाध प्रवाह सुनिश्चित किया जाए, सभी ट्रैफिक सिग्नल 24 घंटे चालू रहें और प्रमुख चौराहों पर विशेषकर व्यस्त समय (सुबह 8 से 12 बजे और शाम 5 से 11 बजे) दो-दो यातायात कर्मियों की तैनाती सुनिश्चित की जाए। न्यायालय ने विशेष रूप से डीसीपी ट्रैफिक को इन निर्देशों का पालन सुनिश्चित करने को कहा।
युगलपीठ ने शहर की मौजूदा यातायात स्थिति पर कड़ी टिप्पणियां करते हुए कहा कि विशेष रूप से यू-टर्न के पास की स्थिति अत्यंत गंभीर और अनियंत्रित है। उन्होंने कहा कि कई महत्वपूर्ण स्थानों पर ट्रैफिक पुलिस की अनुपस्थिति दिखती है और दोपहिया वाहन अनियमित रूप से चलते नजर आते हैं।
अदालत ने टिप्पणी की कि यदि एक प्रशासकीय न्यायाधीश को भी ऐसी असुविधा महसूस हो रही है, तो आम नागरिकों की कठिनाई की कल्पना की जा सकती है। स्थिति इतनी बिगड़ चुकी है कि व्यस्त समय में सामान्य कार्य के लिए बाहर निकलने से पहले भी कई बार सोचना पड़ता है।
सुनवाई के दौरान रोबोट चौराहा और रेडिसन चौराहा की अव्यवस्थित स्थिति का विशेष उल्लेख किया गया। न्यायमूर्ति शुक्ला ने हल्के अंदाज में कहा कि रोबोट चौराहे पर अब कोई “रोबोट” ही नहीं बचा है। इस पर सीनियर एडवोकेट अजय बागडिया ने टिप्पणी की कि प्रशासन ने शहरवासियों को ही “रोबोट” बना दिया है।
अदालत को बताया गया कि बीआरटीएस कॉरिडोर हटाए जाने के बावजूद उससे जुड़ी कई आधारभूत समस्याएं अब भी बनी हुई हैं। होल्कर साइंस कॉलेज के पास बने दो पुलों की उपयोगिता पर पुनर्विचार की मांग की गई। कोर्ट ने निर्देश दिया कि इस संबंध में सुझाव ट्रैफिक मैनेजमेंट कमेटी, लॉयर्स कमेटी और नगर निगम के समक्ष प्रस्तुत किए जाएं।
सुनवाई में यह प्रस्ताव भी रखा गया कि एमपीआरडीसी और आईडीए को भी पक्षकार बनाया जाए, क्योंकि कई मार्ग और यातायात अवरोध उनके अधिकार क्षेत्र में आते हैं। न्यायालय के समक्ष यह मुद्दा भी रखा गया कि शहर की कई सर्विस रोड अनुपयोगी हो चुकी हैं, जिससे मुख्य मार्गों पर दबाव बढ़ रहा है। इसके अलावा अंतर-शहरी और शहर के भीतर चलने वाली बसों के अनियंत्रित ठहराव को भी गंभीर समस्या बताया गया। नियत बस स्टॉप के अभाव में निजी बसें अनधिकृत स्थानों पर रुकती हैं, जिससे जाम की स्थिति बनती है।
डीसीपी यातायात ने स्पष्ट किया कि कोई औपचारिक ‘जीरो ट्रैफिक’ व्यवस्था नहीं है, केवल कुछ मिनटों के लिए यातायात रोका जाता है। इस पर एडवोकेट बागडिया ने कहा कि वास्तविक समस्या तब उत्पन्न होती है जब वीआईपी काफिले के निकलने के बाद यातायात को बिना समुचित नियंत्रण के छोड़ दिया जाता है। ट्रैफिक मैनेजमेंट कमेटी के अध्यक्ष सीनियर एडवोतेट विनय झेलावत ने यातायात कर्मियों की भारी कमी का मुद्दा उठाया। इस पर बागडिया ने कहा कि वे डीसीपी ट्रैफिक को स्वयं शहर में घुमाकर वास्तविक स्थिति दिखाने को तैयार हैं।
सुनवाई के दौरान एडिशनल एडवोकेट जनरल राहुल सेठी ने कलेक्टर, नगर निगम निगम और डीसीपी ट्रैफिक के साथ बैठक कर समन्वित रिपोर्ट प्रस्तुत करने का प्रस्ताव रखा। कोर्ट ने सभी संबंधित विभागों को स्थल निरीक्षण कर व्यावहारिक समाधान प्रस्तुत करने के निर्देश दिए। अगली सुनवाई 7 मई को होगी।
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हिन्दुस्थान समाचार / मुकेश तोमर

