इंदौर के भागीरथपुरा पेयजल त्रासदी पर उमंग सिंघार ने उठाए सवाल, कहा- प्रशासनिक और तकनीकी स्तर पर जवाबदेही तय हो

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इंदौर के भागीरथपुरा पेयजल त्रासदी पर उमंग सिंघार ने उठाए सवाल, कहा- प्रशासनिक और तकनीकी स्तर पर जवाबदेही तय हो


इंदाैर, 02 अक्टूबर (हि.स.)। मध्य प्रदेश के इंदाैर शहर में भागीरथपुरा दूषित पेयजल मामले की न्यायिक जांच रिपोर्ट सार्वजनिक होने के बाद मध्य प्रदेश विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने शुक्रवार को रेसीडेंसी में प्रेस वार्ता कर रिपोर्ट के विभिन्न बिंदुओं पर सरकार और नगर निगम से जवाब मांगा।

उन्होंने कहा कि घटना ने शहर की पेयजल व्यवस्था, पाइपलाइन और सीवरेज नेटवर्क के रखरखाव, निगरानी तथा प्रशासनिक प्रक्रिया से जुड़े सवाल सामने रखे हैं। उन्होंने न्यायिक जांच आयोग की सिफारिशों के अनुसार प्रभावित परिवारों को राहत देने और जिन स्तरों पर जिम्मेदारी बनती है, वहां जवाबदेही तय करने की मांग की। न्यायिक आयोग की रिपोर्ट में भागीरथपुरा में हुई 36 मौतों की जांच का उल्लेख है। सार्वजनिक रिपोर्ट के अनुसार इनमें से 22 मौतों को दूषित पानी से फैली बीमारी से संबंधित पाया गया है।

पेयजल और सीवरेज व्यवस्था पर सवाल

उमंग सिंघार ने कहा कि जांच रिपोर्ट में पेयजल और सीवरेज नेटवर्क की योजना, रखरखाव, निगरानी और पर्यवेक्षण से जुड़ी कमियों का उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार कई स्थानों पर पेयजल और सीवर लाइनें एक-दूसरे के करीब या क्रॉसिंग की स्थिति में थीं। सीवर लाइन से रिसाव और पेयजल पाइपलाइन में नकारात्मक दबाव जैसी परिस्थितियों से दूषित पानी के नेटवर्क में पहुंचने की संभावना को भी जांच में देखा गया।

उन्होंने कहा कि जल आपूर्ति और सीवरेज नेटवर्क से जुड़े ब्लूप्रिंट, डिजाइन, पाइपलाइन अलाइनमेंट और अन्य तकनीकी अभिलेखों की उपलब्धता को लेकर भी रिपोर्ट में सवाल उठे हैं। सिंघार ने कहा कि ऐसे महत्वपूर्ण रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं होने की स्थिति में पाइपलाइन नेटवर्क की निगरानी और समस्या की पहचान प्रभावित हो सकती है।

पाइपलाइन बदलने में देरी का मुद्दा

नेता प्रतिपक्ष ने पाइपलाइन बदलने से जुड़ी प्रक्रिया में हुई देरी का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि करीब ढाई करोड़ रुपए के काम से संबंधित टेंडर और प्रशासनिक प्रक्रिया में देरी हुई। न्यायिक जांच रिपोर्ट के सार्वजनिक विवरण के अनुसार, एक परियोजना में टेंडर प्रक्रिया से लेकर काम पूरा होने तक कुल देरी 859 दिन से अधिक रही। रिपोर्ट में विभिन्न स्तरों पर हुई देरी और पाइपलाइन बदलने की प्रक्रिया की समीक्षा की गई है।

सिंघार ने कहा कि यदि जरूरी पाइपलाइन का काम समय पर पूरा होता तो दूषित पानी की स्थिति को रोकने की संभावना अधिक होती। उन्होंने सरकार से इस प्रक्रिया में हुई देरी की प्रशासनिक जिम्मेदारी स्पष्ट करने की मांग की।

66 दिन फाइल लंबित रहने पर सवाल

उमंग सिंघार ने एक फाइल के मूवमेंट का जिक्र करते हुए कहा कि संबंधित फाइल मेयर के हस्ताक्षर के लिए 66 दिन तक लंबित रही। उन्होंने कहा कि आयोग ने केवल फाइल मेयर के पास लंबित रहने के आधार पर उनकी व्यक्तिगत जिम्मेदारी तय नहीं की है, लेकिन यह स्पष्ट होना चाहिए कि फाइल इतने लंबे समय तक क्यों लंबित रही और देरी के लिए प्रशासनिक स्तर पर किसकी जिम्मेदारी बनती है। उन्होंने कहा कि इतनी महत्वपूर्ण जल एवं सीवरेज परियोजना से जुड़ी फाइलों के निपटारे में देरी की प्रक्रिया की भी समीक्षा होनी चाहिए।

रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं होने पर भी मांगा जवाब

नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि जांच के दौरान कुछ महत्वपूर्ण इंजीनियरिंग और तकनीकी रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं होने की बात सामने आई है। उन्होंने सरकार से पूछा कि पाइपलाइन के डिजाइन, लेआउट और अलाइनमेंट से संबंधित दस्तावेज उपलब्ध क्यों नहीं थे तथा रिकॉर्ड के संरक्षण और उपलब्धता की जिम्मेदारी किस स्तर पर थी।

मुआवजे और चिकित्सा सहायता की मांग

नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंगार ने न्यायिक आयोग की प्रभावित परिवारों के लिए राहत संबंधी सिफारिशों को लागू करने की मांग की। उन्होंने कहा कि मृतकों के परिजनों और प्रभावित मरीजों को आर्थिक तथा चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराने की प्रक्रिया स्पष्ट की जानी चाहिए और सरकार को भुगतान की समयसीमा बतानी चाहिए।

जनप्रतिनिधियों पर लगाए आरोप, रिपोर्ट के निष्कर्ष अलग

प्रेस वार्ता में सिंघार ने आरोप लगाया कि जांच के दौरान कुछ अधिकारियों की जिम्मेदारी तय करने का दबाव बनाया गया तथा तत्कालीन महापौर पुष्यमित्र भार्गव और मंत्री कैलाश विजयवर्गीय की जिम्मेदारी को लेकर भी हस्तक्षेप का प्रयास हुआ। यह सिंघार का आरोप है। दूसरी ओर, रिपोर्ट के सार्वजनिक विवरणों में जनप्रतिनिधियों की व्यक्तिगत जिम्मेदारी तय नहीं किए जाने की बात सामने आई है, जबकि जांच का प्रमुख फोकस जल-सीवर व्यवस्था, तकनीकी खामियों, निगरानी और प्रशासनिक देरी पर रहा।

बता दें कि भागीरथपुरा मामले की न्यायिक जांच रिपोर्ट अगस्त में हाईकोर्ट में पेश की गई थी। बाद में मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने 28 सितंबर को रिपोर्ट को अदालत की वेबसाइट पर अपलोड करने के निर्देश दिए। इसके बाद रिपोर्ट सार्वजनिक हुई।

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हिन्दुस्थान समाचार / नेहा पांडे

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