डोल ग्यारस पर हाटपीपल्या में आस्था का अद्भुत नजारा, नदी के विपरीत बहाव में तीन बार तैरेगी भगवान नृसिंह की पाषाण प्रतिमा
देवास/हाटपीपल्या, 21 सितंबर (हि.स.)। मध्य प्रदेश के देवास जिले के ऐतिहासिक नगर हाटपीपल्या में डोल ग्यारस का पर्व इस बार भी अनूठी आस्था और परंपरा का साक्षी बनेगा। विंध्याचल की पहाड़ियों के बीच स्थित प्राचीन नृसिंह मंदिर से भगवान नृसिंह की करीब साढ़े सात किलो वजनी पाषाण प्रतिमा को पारंपरिक रूप से नदी में तैराया जाएगा। मान्यता है कि प्रतिमा नदी के बहाव की दिशा में नहीं, बल्कि उसके विपरीत दिशा में तैरती है। इस अद्भुत दृश्य को देखने के लिए मालवा अंचल के साथ देश के विभिन्न हिस्सों से बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के हाटपीपल्या पहुंचने की संभावना है।
डोल ग्यारस के अवसर पर नृसिंह घाट पर होने वाले इस आयोजन को लेकर मंदिर समिति और स्थानीय प्रशासन ने तैयारियां पूरी कर ली हैं। घाट पर सुरक्षा व्यवस्था के साथ बैरिकेडिंग, साफ-सफाई और श्रद्धालुओं के लिए आवश्यक व्यवस्थाएं की गई हैं।
बहाव के विपरीत तैरता है पाषाण विग्रह
नृसिंह मंदिर के पुजारियों और स्थानीय जानकारों के अनुसार भगवान नृसिंह की यह पाषाण प्रतिमा पानी में डूबती नहीं है। नदी में छोड़े जाने के बाद प्रतिमा जलधारा के विपरीत दिशा में तैरती है। यही वजह है कि डोल ग्यारस पर होने वाला यह आयोजन हाटपीपल्या की विशिष्ट धार्मिक परंपराओं में शामिल है।
स्थानीय मान्यता के अनुसार प्रतिमा का तीन बार तैरना शुभ संकेत माना जाता है। श्रद्धालुओं के बीच विश्वास है कि यदि डोल ग्यारस पर भगवान नृसिंह की प्रतिमा तीन बार नदी में तैरती है तो आने वाला वर्ष क्षेत्र के लिए सुख-समृद्धि और अच्छी फसल लेकर आता है। वहीं दो बार तैरने को सामान्य और एक बार तैरने अथवा प्रतिमा के नहीं तैरने को प्राकृतिक संकट या अकाल की आशंका से जोड़कर देखा जाता है।
इस परंपरा को लेकर स्थानीय लोगों की आस्था इतनी गहरी है कि प्रतिमा के नदी में उतरने के समय बड़ी संख्या में श्रद्धालु घाट पर मौजूद रहते हैं। वर्ष 2005 में नदी में तेज उफान के बावजूद प्रतिमा के पानी में तैरने का प्रसंग आज भी स्थानीय लोगों के बीच विशेष रूप से याद किया जाता है।
171 साल से चली आ रही परंपरा
हाटपीपल्या में इस आयोजन की परंपरा करीब 171 वर्ष पुरानी बताई जाती है। वर्ष 1855 में बुधवार के दिन शीतला माता मंदिर के सामने ठाकुर भवानी सिंह शक्तावत ने हाट यानी बाजार की स्थापना की थी। इसी के साथ इस क्षेत्र में एक नई सामाजिक और धार्मिक परंपरा ने आकार लिया, जो समय के साथ हाटपीपल्या की पहचान का हिस्सा बन गई।
हाटपीपल्या के नाम को लेकर भी इतिहास और स्थानीय मान्यताओं में अलग-अलग प्रसंग मिलते हैं। बताया जाता है कि वर्ष 1672 में महाराणा उदयसिंह के वंशज शंभु सिंह ने इस जागीर का नाम 'पीपल्या' रखा था। बाद में यहां हाट लगने के कारण यह क्षेत्र हाटपीपल्या के नाम से प्रसिद्ध हो गया।
रामेश्वरम से लाई गई थी प्रतिमा
भगवान नृसिंह की पाषाण प्रतिमा को लेकर स्थानीय स्तर पर एक प्राचीन किंवदंती भी प्रचलित है। बताया जाता है कि किसी समय करीब 10 से 15 हाथियों के साथ महावतों और साधु-संतों का एक बड़ा जत्था इस क्षेत्र में पहुंचा था। तत्कालीन शक्तावत राजपरिवार ने साधु-संतों की सेवा की। सेवा से प्रसन्न होकर एक सिद्ध तपस्वी साधु ने राजपरिवार को भगवान नृसिंह की यह प्रतिमा भेंट की थी।
स्थानीय मान्यता के अनुसार साधु ने बताया था कि वे इस विग्रह को सुदूर रामेश्वरम से लेकर आए हैं। प्रतिमा मिलने के बाद राजा ने विधि-विधान से भगवान नृसिंह का मंदिर बनवाकर उसमें विग्रह की स्थापना कराई। तभी से यह प्रतिमा श्रद्धा और आस्था का केंद्र बनी हुई है।
अंग्रेजों के दौर में भी नहीं टूटी परंपरा
हाटपीपल्या की इस धार्मिक परंपरा को कई कठिन दौर से गुजरना पड़ा। वर्ष 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अंग्रेजी सेना ने क्षेत्र की गढ़ी यानी महल पर हमला कर उसे नष्ट कर दिया था। इस घटनाक्रम के कारण कुछ समय के लिए आयोजन भी प्रभावित हुआ।
उस समय मंदिर के पुजारियों ने भगवान नृसिंह की पाषाण प्रतिमा को सुरक्षित रखने के लिए उसे छिपा दिया था। बाद में जब बागली रियासत के राजा को हाटपीपल्या की जागीर सौंपी गई तो नगरवासियों ने एकजुट होकर मंदिर का जीर्णोद्धार कराया। इसके बाद भगवान नृसिंह के विग्रह को हाथी पर ससम्मान गाजे-बाजे के साथ मंदिर में प्रतिष्ठित किया गया और यह अनूठी धार्मिक परंपरा फिर से शुरू हुई।
नृसिंह घाट पर जुटेगा आस्था का सैलाब
डोल ग्यारस के इस विशेष आयोजन को लेकर नृसिंह घाट पर तैयारियां पूरी कर ली गई हैं। श्रद्धालुओं की बड़ी संख्या को देखते हुए सुरक्षा व्यवस्था मजबूत की गई है। घाट पर बैरिकेडिंग, सफाई और लोगों के बैठने सहित अन्य व्यवस्थाएं की गई हैं।
मंदिर प्रबंधन और स्थानीय नागरिकों की ओर से श्रद्धालुओं को इस पारंपरिक आयोजन में शामिल होने का आमंत्रण दिया गया है। हाटपीपल्या में होने वाले इस आयोजन में पूर्व में देश के कई प्रमुख राजनेताओं, केंद्रीय मंत्रियों और संत समाज के लोगों के भी शामिल होने की बात स्थानीय स्तर पर कही जाती रही है।
सैकड़ों वर्षों से चली आ रही मान्यताओं, ऐतिहासिक प्रसंगों और गहरी जनआस्था के बीच इस बार भी श्रद्धालुओं की निगाहें भगवान नृसिंह की पाषाण प्रतिमा पर रहेंगी। नदी के बहाव के विपरीत प्रतिमा के तैरने का दृश्य देखने के लिए नृसिंह घाट पर बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने की उम्मीद है।
हिन्दुस्थान समाचार / देवेन्द्र राठी

