शिव और शक्ति के योग से ही आती है उत्कृष्टता : कार्तिकेय वाजपेयी

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शिव और शक्ति के योग से ही आती है उत्कृष्टता : कार्तिकेय वाजपेयी


भोपाल, 08 सितंबर (हि.स.)। प्रख्यात लेखक एवं मोटिवेशनल स्पीकर कार्तिकेय वाजपेयी ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति के भीतर एक मौन दृष्टा मौजूद है। यही स्थिरता की अवस्था शिव तत्व है, जबकि प्रकृति निरंतर सृजन करती है और अपने स्वरूप में शक्ति है। शिव और शक्ति के योग के लिए स्थिरता आवश्यक है। किसी भी कार्य में उत्कृष्टता हासिल करने के लिए मन की स्थिरता जरूरी है। इस अर्थ में परफेक्शन शिव और शक्ति का योग है और इसका महत्व करियर से लेकर पूरे जीवन तक है।

कार्तिकेय वाजपेयी मंगलवार को माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में विद्यार्थियों से संवाद कर रहे थे। विश्वविद्यालय के विज्ञापन एवं जनसंपर्क विभाग द्वारा आयोजित कार्यक्रम में उन्होंने अपनी पुस्तक ‘द अनबिकमिंग’ पर भी चर्चा की। उन्होंने बताया कि यह पुस्तक एक ऐसे क्रिकेटर और उसके कोच की कहानी है, जो पूर्णता की तलाश में आगे बढ़ते हैं।

वाजपेयी ने कहा कि बुद्धि और विवेक अलग-अलग हैं। मनुष्य बुद्धि के साथ जन्म लेता है, जो उसकी संज्ञानात्मक क्षमता है, लेकिन विवेक अर्जित करना पड़ता है। इसके लिए साधक बनना होता है। जीवन के उद्देश्य का भी विवेक से गहरा संबंध है। उन्होंने विद्यार्थियों से विचार करने को कहा कि क्या मनुष्य अपने जीवन का उद्देश्य खोजता है या जब वह पूरी तरह तैयार हो जाता है तो जीवन स्वयं उसके सामने उद्देश्य लेकर आता है।

उन्होंने कहा कि वर्तमान समय बेहद अप्रत्याशित है। मनुष्य अक्सर अतीत और भविष्य के संदर्भ में वर्तमान को देखने लगता है। अतीत से तुलना दुख पैदा कर सकती है, जबकि भविष्य की दृष्टि लालसा को जन्म देती है। ऐसे में व्यक्ति वर्तमान क्षण में पूरी तरह उपस्थित नहीं रह पाता।

उन्होंने कहा कि वर्तमान में रहते हुए भी उससे पूरी तरह जुड़ नहीं पाना कम होते एकाग्रता काल की समस्या है। अपनी एकाग्रता बढ़ाने के लिए अनुभव की गहराई में उतरना जरूरी है। जब व्यक्ति किसी घटना को गहराई से अनुभव करता है तो वहां विचारों का हस्तक्षेप कम हो जाता है। अनुभव करने की क्षमता व्यक्ति को जीवन के उद्देश्य की ओर बेहतर ढंग से आगे बढ़ाती है।

उन्होंने कहा कि डिजिटल एल्गोरिथम ने आज मनुष्य को उसकी वास्तविकता से कुछ हद तक अलग कर दिया है। यदि व्यक्ति अपने बारे में भी विचार डिजिटल माध्यमों से हासिल करने लगे तो वह अपनी वास्तविक पहचान से दूर होता जाएगा। इसलिए जरूरी है कि व्यक्ति स्वयं से अपने बारे में सवाल करे और खुद को समय दे। इससे उसकी मौलिकता बनी रहेगी।

उन्होंने कहा कि जीवन को गहराई से अनुभव करने पर सृजनात्मकता विकसित होती है। वर्तमान समय में प्रासंगिक बने रहना जरूरी है, लेकिन इसके साथ अपने वास्तविक स्वरूप को व्यक्त करने का साहस भी होना चाहिए। जब व्यक्ति स्वयं को वास्तविक रूप में व्यक्त कर पाता है, तभी वह अपने प्रति ईमानदार हो सकता है।

वाजपेयी ने कहा कि हमारी इंद्रियां बाहरी दुनिया से संवाद के लिए बनी हैं और हमें बाहरी परिस्थितियों के प्रति जागरूक करती हैं। लेकिन जब इन्हें स्थिर किया जाता है तो भीतर सहजता विकसित होती है। इसे कृष्ण चेतना या कृष्ण तत्व के रूप में भी समझा जा सकता है।

उन्होंने कहा कि आज हर व्यक्ति चाहता है कि दूसरे उस पर ध्यान दें। वक्ता चाहता है कि लोग उसे ध्यान से सुनें और जब ऐसा नहीं होता तो व्यक्ति परेशान हो जाता है। इससे बाहर निकलने के लिए सहज होना जरूरी है। चीजों को बनावटी तरीके से प्रस्तुत करने के बजाय वास्तविक रूप में सामने रखना चाहिए।

वाजपेयी ने कहा कि जीवन वास्तव में स्वयं को खोजने की यात्रा है। यदि व्यक्ति किसी कार्य से पूरी एकाग्रता के साथ जुड़ जाता है और अनावश्यक चीजों से विरक्त हो सकता है तो वह अपने लक्ष्यों की ओर बेहतर ढंग से बढ़ सकता है। सृजनात्मकता सहजता से आती है। विद्यार्थियों के प्रश्नों का उत्तर देते हुए उन्होंने कहा कि व्यक्ति समय की महत्ता को किस तरह अनुभव करता है, यह भी लक्ष्य प्राप्ति की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए विश्वविद्यालय के कुलगुरु विजय मनोहर तिवारी ने कहा कि विद्यार्थियों के जीवन का अंतिम लक्ष्य केवल डिग्री प्राप्त करना नहीं होना चाहिए। औपचारिक शिक्षा के साथ विद्यार्थी विभिन्न क्षेत्रों में अपनी प्रतिभा का बेहतर उपयोग कर सकते हैं। उन्होंने विद्यार्थियों को लेखन के क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए भी प्रोत्साहित किया।

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हिन्दुस्थान समाचार / राजू विश्वकर्मा

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