दमोह में मां महाकाली की आराधना 79वें वर्ष में, आस्था का प्रमुख केंद्र बना महाकाली चौराहा

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दमोह में मां महाकाली की आराधना 79वें वर्ष में, आस्था का प्रमुख केंद्र बना महाकाली चौराहा


दमोह में मां महाकाली की आराधना 79वें वर्ष में, आस्था का प्रमुख केंद्र बना महाकाली चौराहा


दमोह, 16 अक्टूबर (हि.स.)। मध्य प्रदेश के दमोह नगर में मां महाकाली की आराधना की परंपरा आठ दशकों से अधिक समय से श्रद्धा और उत्साह के साथ निभाई जा रही है। नगर के प्रमुख महाकाली चौराहे पर वर्ष 1948 में शुरू हुआ यह धार्मिक आयोजन अब अपने 79वें वर्ष में पहुंच गया है। नवरात्रि के दौरान यहां स्थापित मां महाकाली की भव्य प्रतिमा, सोने-चांदी के आभूषणों से सुसज्जित श्रृंगार और नौ दिनों तक चलने वाले धार्मिक अनुष्ठान श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र बने रहते हैं। यह उत्सव दमोह की धार्मिक आस्था के साथ उसकी सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक एकता का भी प्रतीक है।

सराफा व्यापारियों ने रखी थी परंपरा की नींव

महाकाली उत्सव समिति के अध्यक्ष पं. प्रहलाद प्रसाद अवस्थी के अनुसार, मां महाकाली की प्रतिमा स्थापना की शुरुआत वर्ष 1948 में नगर के सराफा व्यापारियों ने की थी। इस परंपरा को आगे बढ़ाने में स्वर्गीय राज बहादुर राय, स्वर्गीय कालूराम सोनी सहित अन्य धर्मप्रेमियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही। बाद में समिति के पूर्व अध्यक्ष स्वर्गीय सुभाष राय और उनके सहयोगियों ने भी आयोजन की निरंतरता बनाए रखने में योगदान दिया।

वर्तमान में समिति के सदस्यों और नगरवासियों के सामूहिक सहयोग से उत्सव की सभी व्यवस्थाएं की जाती हैं। कई परिवारों की पीढ़ियां लंबे समय से इस धार्मिक परंपरा से जुड़ी हैं। यही वजह है कि महाकाली उत्सव दमोह की सांस्कृतिक पहचान का अभिन्न हिस्सा बन चुका है।

सोने-चांदी के आभूषणों से होता है मां का श्रृंगार

नवरात्रि के दौरान मां महाकाली की प्रतिमा का सोने और चांदी के आभूषणों से विशेष श्रृंगार किया जाता है। आभूषणों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए प्रशासन की ओर से चौबीस घंटे सशस्त्र सुरक्षा व्यवस्था उपलब्ध कराई जाती है। समिति के स्वयंसेवक भी रात के समय सेवाएं देते हैं और सुरक्षा व्यवस्था के साथ श्रद्धालुओं की सुविधाओं का ध्यान रखते हैं।

नौ दिन तक शतचंडी अनुष्ठान और दुर्गा पाठ

नवरात्रि के नौ दिनों तक महाकाली दरबार में विशेष धार्मिक अनुष्ठान होते हैं। आचार्य पं. चंद्रगोपाल पौराणिक के मार्गदर्शन में विद्वान पंडित प्रतिदिन शाम चार बजे से सामूहिक श्री दुर्गा पाठ और शतचंडी अनुष्ठान संपन्न कराते हैं।

वैदिक मंत्रोच्चार, दुर्गा सप्तशती के पाठ और हवन में बड़ी संख्या में श्रद्धालु भाग लेते हैं। हवन के बाद वितरित किए जाने वाले अभिमंत्रित गंडे के प्रति भी भक्तों की गहरी आस्था है। इसे प्राप्त करने के लिए दमोह नगर के साथ आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों से भी श्रद्धालु पहुंचते हैं।

सप्तमी पर महाआरती और छप्पन भोग

मां महाकाली की नियमित पूजा-अर्चना और आरती पुजारी पं. राजेश तिवारी द्वारा संपन्न कराई जाती है। नवरात्रि की सप्तमी तिथि पर विशेष महाआरती के साथ छप्पन भोग लगाया जाता है। इस अवसर पर मां के दर्शन करने और प्रसाद ग्रहण करने के लिए बड़ी संख्या में भक्त पहुंचते हैं। पूजा-पाठ, हवन और मां के जयकारों से महाकाली चौराहे सहित आसपास का क्षेत्र भक्तिमय हो उठता है।

सामूहिक सहभागिता से कायम है परंपरा

समिति के अनुसार, मां की प्रतिमा स्थापना से लेकर विसर्जन तक की व्यवस्थाएं सामूहिक सहयोग से संचालित होती हैं। आयोजन में वीरेंद्र राय, रंजीत राय और शिवम राय सहित अनेक श्रद्धालु और वार्डवासी सक्रिय भूमिका निभाते हैं। बुजुर्गों के अनुभव और युवाओं के उत्साह के मेल से यह परंपरा हर वर्ष आगे बढ़ रही है।

वर्ष 1948 में सीमित संसाधनों के साथ शुरू हुआ यह आयोजन समय के साथ व्यापक स्वरूप ले चुका है। बदलते सामाजिक परिवेश के बावजूद प्रतिमा स्थापना, पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठानों की परंपरा लगातार जारी है।

महाकाली चौराहे का यह उत्सव धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक एकजुटता, सामूहिक सहभागिता और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण का भी उदाहरण है। करीब आठ दशकों से मां महाकाली की आराधना की यह परंपरा दमोह के लोगों को जोड़ने के साथ नगर की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को भी मजबूत कर रही है।

हिन्दुस्थान समाचार / हंसा वैष्णव

Livevns.news Desk
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