एमसीयू में टेड टॉक का समापन: खुद पर नियंत्रण से बदली जा सकती है जिंदगी

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एमसीयू में टेड टॉक का समापन: खुद पर नियंत्रण से बदली जा सकती है जिंदगी


भोपाल, 08 अक्टूबर (हि.स.)। जीवन में सकारात्मक बदलाव के लिए जरूरी नहीं कि हमेशा बड़े कदम उठाए जाएं। अपनी वाणी, मन, सोच, व्यवहार, धन और मोबाइल के इस्तेमाल जैसी छोटी-छोटी चीजों पर नियंत्रण रखकर भी जीवन में बड़ा बदलाव लाया जा सकता है। अच्छी जिंदगी, बेहतर स्वास्थ्य, अच्छा रोजगार और समाज में सम्मान पाने की इच्छा व्यक्ति को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती है। जीवन में आगे बढ़ने के लिए कई बार पुरानी गलतियों, विचारों और तौर-तरीकों को छोड़ना भी जरूरी होता है।

यह बात मोटिवेशनल गुरु राजीव अग्रवाल ने गुरूवार को माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय (एमसीयू) में आयोजित टेड टॉक के समापन अवसर पर कही। उन्होंने विद्यार्थियों से कहा कि जीवन का कोई तय मैनुअल नहीं होता। व्यक्ति को अपने अनुभवों के आधार पर जीवन को समझना और उसके बारे में नए तरीके से सोचना पड़ता है। हमारे साथ दूसरे लोग कैसा व्यवहार करेंगे, यह हमारे हाथ में नहीं है, लेकिन हम दूसरों के साथ कैसा व्यवहार करें, इस पर हमारा नियंत्रण जरूर है।

पांच चीजों पर नियंत्रण से बदलाव

राजीव अग्रवाल ने कहा कि जीवन में बेहतर परिणाम पाने के लिए व्यक्ति को स्वयं पर काम करना चाहिए। उन्होंने विद्यार्थियों को जीवन से जुड़ी पांच चीजों को नियंत्रित करने की बात कही। जिसमें माउथ कंट्रोल, मूड कंट्रोल, माइंड कंट्रोल और मनी कंट्रोल ।

मैनर्स कंट्रोल: उन्होंने कहा कि व्यक्ति के तौर-तरीके उसकी परवरिश और व्यक्तित्व की पहचान कराते हैं। इसलिए व्यवहार में नम्रता होनी चाहिए। प्लीज, सॉरी और थैंक यू जैसे शब्दों को जीवन का हिस्सा बनाने की जरूरत है।

उन्होंने मोबाइल के इस्तेमाल को भी नियंत्रित करने की जरूरत बताई। उनका कहना था कि मोबाइल आज जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है, इसलिए उस पर की जाने वाली गतिविधियों पर भी नियंत्रण रखना जरूरी है।

रिएक्ट नहीं, सोचकर रिस्पॉन्स दें : डॉ. ऋतु पांडे शर्मा

दूसरे सत्र में रेखी फाउंडेशन की हैप्पीनेस कोच डॉ. ऋतु पांडे शर्मा ने सजग और चैतन्य रहकर जीवन जीने के तरीके और उसके लाभ बताए। उन्होंने कहा कि हमारा मस्तिष्क असीम संभावनाओं से भरा है। हम जो भी काम बार-बार करते हैं, वह धीरे-धीरे आदत और व्यवहार का पैटर्न बन जाता है।

उन्होंने कहानियों के माध्यम से विद्यार्थियों को माइंडफुलनेस का अर्थ समझाया और बताया कि नकारात्मक विचार आने पर उनसे खुद को कैसे बचाया जा सकता है। उनका कहना था कि सोच में बदलाव लाकर व्यक्तित्व में भी बदलाव किया जा सकता है। जीवन है तो समस्याएं भी होंगी और समस्या है तो समाधान भी होगा।

डॉ. ऋतु ने कहा कि भागदौड़ भरी जिंदगी में किसी कदम को उठाने से पहले हमें ठहरकर सोचना और विचार करना चाहिए। यदि ऐसा नहीं कर रहे हैं तो जीवन में एक 'पॉज' की जरूरत है। किसी घटना, व्यक्ति या बात पर तुरंत रिएक्ट करने के बजाय रिस्पॉन्स को प्राथमिकता देनी चाहिए।

विरासत को समझना युवाओं की जिम्मेदारी : विजय मनोहर तिवारी

विरासत संरक्षण विषय पर विश्वविद्यालय के कुलगुरू विजय मनोहर तिवारी ने कहा कि भारत में पर्यटन उद्योग पिछले दो दशकों में तेजी से बढ़ा है। देश के भीतर और विदेशों से बड़ी संख्या में पर्यटक ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण स्थलों की ओर पहुंच रहे हैं। ऐतिहासिक स्मारक और स्थान आज पर्यटन के प्रमुख केंद्र बन गए हैं।

उन्होंने औपनिवेशिक काल के तीन विदेशी युवाओं के उदाहरण देते हुए भारतीय पुरातत्व के अध्ययन और संरक्षण में उनके योगदान की चर्चा की। उन्होंने बताया कि ब्रिटिश काल में 19 वर्ष की उम्र में मैकेनिकल इंजीनियर एलेक्जेंडर कनिंघम भारत आया था। अपने मित्र जेम्स प्रिंसेप के संपर्क में आने के बाद उसकी रुचि पुरातत्व और इतिहास में बढ़ी। बाद में उसके प्रयासों से भारत में आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (एएसआई) जैसी संस्था की स्थापना हुई और कनिंघम इसके पहले महानिदेशक बने। उन्होंने देशभर में पुरातात्विक महत्व के स्थलों का सर्वे किया।

कुलगुरू ने एएसआई के निदेशक रहे 25 वर्षीय जॉन मार्शल का भी उल्लेख किया। उन्होंने देशभर के ऐतिहासिक स्थलों का सर्वे कर महत्वपूर्ण रिपोर्ट तैयार कीं। उनके शोध से दुनिया के इतिहासकारों को भारत की विरासत को देखने का नया दृष्टिकोण मिला।

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हिन्दुस्थान समाचार / राजू विश्वकर्मा

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