शाजापुर की चिलर नदी में प्रदूषण का खतरा, जल परीक्षण में पीएच 4.3 मिलने से चिंता बढ़ी
शाजापुर, 11 अगस्त (हि.स.)। कभी शाजापुर की जीवनरेखा और पहचान रही ऐतिहासिक चिलर नदी, जिसका प्राचीन नाम चंद्रलेखा बताया जाता है, आज गंभीर प्रदूषण की समस्या से जूझ रही है। नदी के पानी के हालिया परीक्षण में पीएच स्तर 4.3 दर्ज किया गया है। यह सामान्य प्राकृतिक जल के लिए अपेक्षित 6.5 से 8.5 की सीमा से काफी कम है। परीक्षण के इस परिणाम ने नदी के पानी की गुणवत्ता को लेकर चिंता बढ़ा दी है।
‘सेव चंद्रलेखा’ अभियान के तहत नदी को प्रदूषण से बचाने की पहल कर रहे जागरूक युवाओं ने पानी का परीक्षण कराया। जांच में पानी का पीएच स्तर अत्यधिक कम पाया गया। अभियान से जुड़े लोगों के अनुसार इतना कम पीएच पानी के अत्यधिक अम्लीय होने का संकेत देता है। ऐसी स्थिति में पानी संक्षारक हो सकता है और पाइप, बर्तन तथा अन्य धातुओं के क्षरण की संभावना बढ़ सकती है। इसके साथ ही जलीय जीव-जंतुओं और वनस्पतियों पर भी इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
सिंचाई में उपयोग को लेकर भी चिंता
चिलर नदी के पानी का उपयोग यदि सिंचाई के लिए किया जा रहा है तो इससे मिट्टी के रासायनिक संतुलन और प्राकृतिक उर्वरता पर असर पड़ने की आशंका जताई गई है। ऐसे में पानी को सिंचाई अथवा अन्य उपयोग में लेने से पहले विस्तृत वैज्ञानिक परीक्षण आवश्यक माना जा रहा है।
जल परीक्षण में टीडीएस/ईसी का मान 531 दर्ज किया गया है। अभियान से जुड़े लोगों का कहना है कि यह आंकड़ा अकेले अत्यधिक चिंताजनक नहीं है, लेकिन केवल टीडीएस सामान्य पाए जाने के आधार पर पानी को सुरक्षित नहीं माना जा सकता। पीएच 4.3 जैसे परिणाम के बाद पानी में भारी धातुओं, रासायनिक प्रदूषकों और अन्य संभावित हानिकारक तत्वों की विस्तृत प्रयोगशाला जांच जरूरी है।
प्रदूषण के स्रोत की पहचान की मांग
‘सेव चंद्रलेखा’ अभियान से जुड़े युवाओं ने नदी में प्रदूषण के संभावित स्रोतों की जांच कराने की मांग की है। उनका कहना है कि शहर के कई गंदे नालों का पानी नदी में पहुंच रहा है। इसके अलावा संभावित औद्योगिक अपशिष्ट अथवा रासायनिक रिसाव की आशंका की भी गंभीरता से जांच की जानी चाहिए।
अभियान से जुड़े लोगों ने प्रशासन और संबंधित विभागों से स्वतंत्र एवं प्रमाणित प्रयोगशाला के माध्यम से नदी के पानी की विस्तृत जांच कराने, प्रदूषण के वास्तविक स्रोतों को चिन्हित करने और उन्हें रोकने की तत्काल व्यवस्था करने की मांग की है। उनका कहना है कि यदि पानी में अम्लीयता की पुष्टि होती है तो विशेषज्ञों की निगरानी में उपयुक्त उपचार की संभावनाओं पर भी विचार किया जाना चाहिए।
अभियान से जुड़े सदस्यों का कहना है कि अब केवल नदी की सफाई पर्याप्त नहीं है, बल्कि चिलर नदी का पुनर्जीवन जरूरी है। उनके अनुसार चिलर महज पानी की धारा नहीं, बल्कि शाजापुर की पहचान और ऐतिहासिक विरासत का हिस्सा है तथा इसके संरक्षण का सीधा संबंध आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से है।
हिन्दुस्थान समाचार / मंगल नाहर

