राजगढ़ः400 साल पुरानी आस्था का धाम, भैंसवा माता की पहाड़ी पर आज भी गूंजती है दूधतलाई की कहानी

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राजगढ़ः400 साल पुरानी आस्था का धाम, भैंसवा माता की पहाड़ी पर आज भी गूंजती है दूधतलाई की कहानी


राजगढ़, 12 अगस्त (हि.स.)। मध्य प्रदेश के राजगढ़ जिले की पहाड़ियों के बीच बसा भैंसवा माता मंदिर सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि करीब 400 वर्षों से चली आ रही आस्था, लोकविश्वास और परंपराओं की जीवंत कहानी है। सांडावता हाईवे से करीब 19 किलोमीटर दूर पहाड़ी की चोटी पर स्थित यह धाम बीजासन माता को समर्पित है।

मान्यता है कि माता ने यहां प्रकट होकर भक्तों के दुख दूर किए थे। यही विश्वास आज भी हजारों श्रद्धालुओं को इस धाम तक खींच लाता है। तालाब का पानी बन जाता था दूध, यहीं से पड़ा ‘दूधतलाई’ नाम भैंसवा माता से जुड़ी सबसे चर्चित लोककथा बंजारा कबीले की एक बालिका से जुड़ी है।

लोकमान्यता के अनुसार लाखा बंजारा के कबीले में एक ऐसी बालिका थी, जिसमें दैवीय शक्तियां थीं। वह जिस स्थानीय तालाब से गाय-भैंसों के लिए पानी लाती थी, उसका पानी दूध में बदल जाता था। इसी कारण यह स्थान आगे चलकर ‘दूधतलाई’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। कहा जाता है कि जब बालिका के पिता को इस रहस्य का पता चला तो वह धरती में समा गई। इसके बाद उसके देवी रूप में प्रकट होने की मान्यता बनी और यही स्थान भैंसवा माता के पवित्र धाम के रूप में प्रतिष्ठित हो गया।

सदियों बाद भी दूधतलाई से जुड़ी यह कथा श्रद्धालुओं के बीच कौतूहल और आस्था का विषय बनी हुई है। पहाड़ी की चोटी पर ‘भक्ति का दुर्ग’ समय के साथ बंजारा कबीले के पड़ाव का यह क्षेत्र महत्वपूर्ण तीर्थस्थल बन गया। पहाड़ी की चोटी पर स्थित मंदिर तक पहुंचते ही प्रकृति और आध्यात्मिकता का अनूठा संगम दिखाई देता है। श्रद्धालु इसे प्रेम से ‘भक्ति का दुर्ग’ भी कहते हैं। पालकी निकलते ही गांव-गांव जुड़ती है आस्था भैंसवा माता धाम की सबसे खास परंपराओं में पालकी यात्रा शामिल है। मुख्य मंदिर से माता की प्रतिमा को पालकी में विराजमान कर आसपास के गांवों के मंदिरों तक ले जाया जाता है। यात्रा के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होते हैं। गांव-गांव से जुड़ती यह परंपरा सामूहिक आस्था और धार्मिक एकता का प्रतीक बन चुकी है।

नवरात्रि और माघ मेले में उमड़ता है सैलाब चैत्र और अश्विन नवरात्रि में मंदिर परिसर विशेष धार्मिक आयोजनों से भक्तिमय हो जाता है। माघ मेले के दौरान भी दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंचते हैं। बढ़ती भीड़ को देखते हुए मंदिर परिसर का विस्तार भी किया गया है। भैंसवा माता धाम की पहचान आज लोककथा, प्रकृति, परंपरा और आस्था के अनूठे संगम के रूप में है। दूधतलाई की रहस्यमयी कथा से लेकर पालकी यात्रा और नवरात्रि के आयोजनों तक, यह धाम राजगढ़ की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ा रहा है।

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हिन्दुस्थान समाचार / मनोज पाठक

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