धीरेन्द्र शास्त्री की टिप्पणी से बंग समाज नाराज, सार्वजनिक माफी की मांग

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धीरेन्द्र शास्त्री की टिप्पणी से बंग समाज नाराज, सार्वजनिक माफी की मांग


जबलपुर, 10 सितंबर (हि.स.)। बागेश्वर धाम के कथावाचक पं. धीरेन्द्र शास्त्री की बंग समाज और दुर्गा पूजा से जुड़ी परंपराओं को लेकर कथित टिप्पणी पर जबलपुर के बंगा समाज ने नाराजगी जताई है। समाज के पदाधिकारियों ने गुरुवार को आयोजित वार्ता में टिप्पणी पर कड़ी आपत्ति दर्ज कराते हुए पं. धीरेन्द्र शास्त्री से सार्वजनिक रूप से माफी मांगने की मांग की।

बंगा समाज का कहना है कि बंग समुदाय की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराएं सैकड़ों वर्षों से चली आ रही हैं। आदिशक्ति मां दुर्गा और मां काली की आराधना इन परंपराओं का महत्वपूर्ण हिस्सा है। समाज के अनुसार, इन मान्यताओं को पाखंड बताना करोड़ों बंगभाषियों की धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाला है।

समाज के पदाधिकारियों ने कहा कि पं. धीरेन्द्र शास्त्री कथावाचक हैं और उन्हें अपनी धार्मिक मान्यताओं एवं विचारों को रखने का पूरा अधिकार है। हालांकि, समाज का कहना है कि मां दुर्गा के महाप्रसाद को मांसाहारी भोजन से जोड़ना और बंग समुदाय की धार्मिक परंपराओं को लेकर टिप्पणी करना उचित नहीं है। बंगा समाज ने पं. धीरेन्द्र शास्त्री से अपनी टिप्पणी पर खेद व्यक्त करते हुए सार्वजनिक रूप से माफी मांगने की मांग की है। समाज ने कहा कि धार्मिक आस्थाओं और परंपराओं को लेकर किसी भी टिप्पणी से पहले उनके ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पक्ष को समझना जरूरी है।

समाज के पदाधिकारियों ने बताया कि बंगाल सहित देश के विभिन्न हिस्सों में मनाई जाने वाली दुर्गा पूजा में महालया का विशेष महत्व है। महालया की सुबह मां दुर्गा के आगमन का वर्णन स्वर्गीय वीरेन्द्र कृष्ण भद्र की आवाज में सुनने की परंपरा बंग समुदाय में आज भी गहरी आस्था के साथ कायम है। समाज ने कहा कि इस वर्ष दुर्गा पूजा के दौरान 'वीरेन्द्र बनाम धीरेन्द्र' की चर्चा भी देखने को मिल सकती है।

बंगा समाज ने पं. धीरेन्द्र शास्त्री से देश के प्रमुख शक्तिपीठों, असम स्थित कामाख्या मंदिर और मां काली के विभिन्न स्वरूपों के मंदिरों में प्रचलित पूजा पद्धतियों का अध्ययन करने का आग्रह किया है। समाज का कहना है कि शक्ति उपासना की परंपराओं का इतिहास काफी प्राचीन है और इन्हें उनके धार्मिक एवं सांस्कृतिक संदर्भ में समझने की आवश्यकता है।

समाज के अनुसार, शक्ति उपासना में बलि की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है। समय के साथ अनेक स्थानों पर पशुबलि के स्थान पर प्रतीकात्मक रूप से भूरा कद्दू, केला और गन्ने आदि का उपयोग किया जाने लगा है।

बंगा समाज ने कहा कि इन परंपराओं की पृष्ठभूमि और धार्मिक मान्यताओं को जाने-समझे बिना उनके बारे में टिप्पणी करना उचित नहीं है। समाज ने अपनी आपत्ति दर्ज कराते हुए पं. धीरेन्द्र शास्त्री से सार्वजनिक रूप से खेद व्यक्त करने और माफी मांगने की मांग दोहराई है।

हिन्दुस्थान समाचार / विलोक पाठक

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