मोह ही पाप का मूल कारण, ‘मैं और मेरा’ का भाव छोड़ें: आचार्य सागरचन्द्र सागरजी

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मोह ही पाप का मूल कारण, ‘मैं और मेरा’ का भाव छोड़ें: आचार्य सागरचन्द्र सागरजी


मंदसौर, 24 जुलाई (हि.स.)। मनुष्य के जीवन में होने वाले अधिकांश पापकर्मों का मूल कारण राग और मोह है। यदि व्यक्ति मोह का त्याग कर दे तो वह स्वतः ही अनेक प्रकार के पापकर्मों से बच सकता है। यह विचार शुक्रवार को मध्‍य प्रदेश के मंदसौर शहर में आचार्य श्री अशोक सागर सुरिश्वरजी महाराज की पावन निश्रा में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए आचार्य श्री सागरचन्द्र सागरजी महाराज ने व्यक्त किए।

पद्मावती परिणय रिसॉर्ट में आयोजित धर्मसभा का आयोजन नाकोड़ा पार्श्वनाथ जैन श्रीसंघ पद्मावती नगर, वासुपूज्य स्वामी जैन ट्रस्ट मंडल आनंद विहार, नागेश्वर पार्श्वनाथ जैन मंदिर ट्रस्ट तिरुपति नगर तथा चोरड़िया परिवार के संयुक्त तत्वावधान में किया गया।

धर्मसभा में आचार्य श्री ने कहा कि जैन धर्म और दर्शन में राग (मोह) को पाप का प्रमुख कारण माना गया है। उन्होंने कहा कि मनुष्य जब तक ‘मैं’ और ‘मेरा’ के भाव से जुड़ा रहता है, तब तक वह मोह के बंधन में रहता है। आत्मकल्याण के लिए इन भावों का त्याग आवश्यक है।

उन्होंने जैन मंदिरों की महत्ता बताते हुए कहा कि प्रत्येक श्रद्धालु को प्रतिदिन मंदिर जाकर विधि-विधान से भगवान की प्रतिमा का पूजन करना चाहिए। नियमित पूजा-अर्चना से आत्मिक शांति और आध्यात्मिक आनंद की प्राप्ति होती है। उन्होंने कहा कि तीर्थंकरों की प्रतिमाएं श्रद्धालुओं को परमात्मा से जोड़ने का माध्यम हैं और प्रत्येक जैन तीर्थ की अपनी विशेष आध्यात्मिक महत्ता होती है।

आचार्य श्री ने जैन आगम में वर्णित चैत्यवंदन का उल्लेख करते हुए कहा कि उसमें मंदिर में प्रवेश से लेकर पूजा-विधि, स्तुति, मौन और आचरण तक का विस्तृत वर्णन मिलता है। श्रद्धा और एकाग्रता के साथ परमात्मा की स्तुति करने से जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आते हैं।

उन्होंने तुलसीदास, मीराबाई और सूरदास जैसे संतों के जीवन का उदाहरण देते हुए कहा कि इन महान विभूतियों ने ईश्वर भक्ति के माध्यम से अमर यश प्राप्त किया। यदि जीवन में वास्तविक सुख और सम्मान चाहिए तो सच्चे मन से परमात्मा का स्मरण और स्तुति करनी चाहिए।

गुरु की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए आचार्य सागरचन्द्र सागरजी ने कहा कि गुरु केवल ज्ञान ही नहीं देते, बल्कि व्यक्ति की दृष्टि और विचार दोनों को बदलने की क्षमता रखते हैं। उन्होंने महाभारत का उदाहरण देते हुए कहा कि गुरु द्रोणाचार्य के मार्गदर्शन ने पांडवों को श्रेष्ठ ज्ञान और संस्कार प्रदान किए। इसलिए जीवन में योग्य गुरु का सान्निध्य आत्मिक उन्नति का महत्वपूर्ण आधार है।

हिन्दुस्थान समाचार / अशोक झलोया

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