एम्स भोपाल में असिस्टेंट प्रोफेसर की दर्दनाक मौत
23 दिन वेंटिलेटर पर संघर्ष के बाद डॉ. रश्मि वर्मा का निधन, सिस्टम पर उठे गंभीर सवाल
भोपाल, 05 जनवरी (हि.स.)। एम्स भोपाल की ट्रॉमा एवं इमरजेंसी विभाग की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. रश्मि वर्मा अब इस दुनिया में नहीं रहीं। 23 दिनों तक जिंदगी और मौत के बीच चले संघर्ष के बाद सोमवार सुबह उन्होंने अंतिम सांस ली। उनका निधन देश के सबसे प्रतिष्ठित मेडिकल संस्थानों में से एक के कामकाजी माहौल, डॉक्टरों पर बढ़ते मानसिक दबाव और तथाकथित ‘टॉक्सिक वर्क कल्चर’ पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
क्या है पूरा मामला
डॉ. रश्मि वर्मा एम्स भोपाल में ट्रॉमा और इमरजेंसी विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर पदस्थ थीं। बताया जा रहा है कि ड्यूटी समाप्त करने के बाद वे अपने घर लौटीं, जहां पहले से लगी आईवी लाइन (कैन्युला) के जरिए उन्होंने खुद को एनेस्थीसिया की अत्यधिक मात्रा दे ली। कुछ ही समय में उनकी हालत बिगड़ गई। जब परिवार के सदस्यों ने उन्हें बेहोशी की हालत में पाया तो तत्काल एम्स भोपाल ले जाया गया। जांच में सामने आया कि एनेस्थीसिया के ओवरडोज का सीधा असर उनके हृदय पर पड़ा, जिससे उन्हें कार्डियक अरेस्ट हुआ। करीब सात मिनट तक दिल की धड़कनें बंद रहीं, जिसके कारण उन्हें गंभीर ब्रेन डैमेज हो गया।
23 दिन की जंग और अंत
जिस आईसीयू में डॉ. रश्मि वर्मा रोजाना मरीजों की जान बचाने का काम करती थीं, उसी आईसीयू में उनका इलाज चला। डॉक्टरों की विशेषज्ञ टीम ने हर संभव प्रयास किए, लेकिन लंबे समय तक ऑक्सीजन की कमी और ब्रेन डैमेज के चलते उनकी हालत में कोई सुधार नहीं हो सका। 23 दिनों तक वेंटिलेटर सपोर्ट पर रहने के बाद सोमवार सुबह उनके निधन की पुष्टि एम्स प्रशासन ने की। इसके बाद पूरे संस्थान में शोक की लहर फैल गई।
काम का दबाव और प्रशासनिक नोटिस
सहकर्मियों के अनुसार, डॉ. रश्मि लंबे समय से अत्यधिक वर्कलोड और मानसिक तनाव में थीं। घटना से कुछ समय पहले उन्हें ‘सीरियस मिसकंडक्ट’ से जुड़ा एक नोटिस भी जारी किया गया था। अपने लिखित जवाब में उन्होंने इसे अपमानजनक और मानसिक रूप से प्रताड़ित करने वाला बताया था। मामला सामने आने के बाद एम्स प्रशासन ने ट्रॉमा एवं इमरजेंसी विभाग के एचओडी को पद से हटाते हुए फैक्ट फाइंडिंग और हाई लेवल कमेटी गठित कर जांच के आदेश दिए हैं।
मेधावी चिकित्सक की अधूरी यात्रा
डॉ. रश्मि वर्मा एक मेधावी और संवेदनशील चिकित्सक के रूप में जानी जाती थीं। उन्होंने प्रयागराज के एमएलएन मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस और गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज से एमडी की डिग्री हासिल की थी। वे डायबिटीज कोर्स सहित कई अकादमिक और रिसर्च गतिविधियों से जुड़ी थीं और विभिन्न संस्थानों में अध्यापन का अनुभव रखती थीं। उनके पति भी ऑर्थोपेडिक विशेषज्ञ हैं। परिवार के अनुसार, घर का माहौल पूरी तरह सामान्य था।
---------------
हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी

