कलचुरीकालीन मढ़ीबाह मंदिर में सावन सोमवार को लगता है आस्था का मेला, वनभोज की सदियों पुरानी परंपरा आज भी कायम

WhatsApp Channel Join Now
कलचुरीकालीन मढ़ीबाह मंदिर में सावन सोमवार को लगता है आस्था का मेला, वनभोज की सदियों पुरानी परंपरा आज भी कायम


उमरिया, 24 अगस्त (हि.स.)। मध्य प्रदेश के उमरिया जिले में सावन मास शुरू होते ही प्रसिद्ध ऐतिहासिक मढ़ीबाह मंदिर में आस्था और परंपरा का अनूठा संगम देखने को मिलता है। आबादी से करीब सात-आठ किलोमीटर दूर घने जंगल के बीच स्थित इस प्राचीन मंदिर में सावन के प्रत्येक सोमवार को हजारों श्रद्धालु पहुंचते हैं। भगवान भोलेनाथ की पूजा-अर्चना के बाद यहां सदियों पुरानी वनभोज की परंपरा निभाई जाती है। इस दौरान पूरा क्षेत्र मेले जैसा नजर आता है।

सावन सोमवार को श्रद्धालु पूरे नगर और आसपास के लोगों को वनभोज में शामिल होने का निमंत्रण देते हैं। सुबह से ही मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं के पहुंचने का सिलसिला शुरू हो जाता है। भगवान शिव की पूजा और आराधना के बाद हर-हर महादेव के जयघोष से जंगल का वातावरण गूंज उठता है। इसके बाद वनभोज का आयोजन शुरू होता है, जिसमें बच्चे, महिलाएं, बुजुर्ग और युवा सभी उत्साह के साथ शामिल होते हैं।

दोपहर करीब तीन बजे से श्रद्धालुओं को भोजन कराने का सिलसिला शुरू होता है, जो अंधेरा होने तक चलता है। जंगल के बीच बड़ी संख्या में लोग स्वयं भोजन तैयार करते हैं और श्रद्धाभाव से आने वाले श्रद्धालुओं को भोजन कराते हैं। वनभोज की यह परंपरा धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक मेलजोल का भी माध्यम बनी हुई है।

मनोकामना पूरी होने पर करते हैं भंडारा

मढ़ीबाह मंदिर में सावन के प्रत्येक सोमवार को श्रद्धालुओं की ओर से विशाल भंडारे आयोजित किए जाते हैं। मान्यता है कि यहां भगवान भोलेनाथ से मांगी गई मनोकामना पूरी होती है। इसी विश्वास के चलते श्रद्धालु अपनी मनोकामना पूर्ण होने के बाद भंडारा आयोजित करते हैं।

ऐसे ही श्रद्धालु गणेश गुप्ता हैं। उनका कहना है कि भगवान भोलेनाथ की कृपा से उनकी मनोकामना पूरी हुई, जिसके बाद उन्होंने मंदिर में भंडारा शुरू किया। गणेश गुप्ता के अनुसार वे पिछले 11 वर्षों से लगातार भंडारा कर रहे हैं। शुरुआत छोटे स्तर से की गई थी, लेकिन श्रद्धालुओं की संख्या और अपनी सामर्थ्य के अनुसार अब आयोजन का स्वरूप बड़ा होता गया है। उन्होंने बताया कि अब हर वर्ष सावन माह के चौथे सोमवार को भंडारा आयोजित करने का संकल्प लिया है।

कलचुरीकालीन स्थापत्य का अद्भुत उदाहरण

मढ़ीबाह मंदिर उमरिया जिले की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहरों में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। मंदिर की स्थापत्य कला अपने समय के अन्य मंदिरों से अलग दिखाई देती है। यह मंदिर एक ऊंचे और विशाल चबूतरे पर निर्मित है। मंदिर के मुख्य कक्ष की छत का मध्य भाग अपेक्षाकृत ऊंचा बनाया गया है और इसकी आंतरिक संरचना में भी आकर्षक नक्काशी देखने को मिलती है।

मंदिर की शिल्पकला में तत्कालीन जीवन दर्शन की झलक मिलती है। पत्थरों पर मूर्तिकारों ने जीवन के विभिन्न पक्षों को जीवंतता के साथ उकेरा है। प्रेम, धर्म और मोक्ष जैसे जीवन के विविध आयामों की कलात्मक अभिव्यक्ति यहां की स्थापत्य शैली को विशिष्ट बनाती है।

बताया जाता है कि मढ़ीबाह मंदिर का निर्माण कलचुरी वंश के राजा महेंद्र वर्मा ने करीब एक हजार वर्ष पहले कराया था। ऐतिहासिक महत्व के साथ धार्मिक आस्था के कारण भी यह मंदिर दूर-दूर तक प्रसिद्ध है और स्थानीय लोगों के लिए गौरव का विषय है।

जंगल के बीच प्राकृतिक सौंदर्य भी आकर्षण

मंदिर तक पहुंचने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों को धार्मिक वातावरण के साथ प्राकृतिक सौंदर्य भी आकर्षित करता है। घने जंगल के बीच मंदिर परिसर में चलने वाली ठंडी हवाएं और समीप स्थित पानी के कुंड का मीठा जल लोगों को यहां कुछ समय सुकून से बिताने के लिए प्रेरित करता है। दूर-दूर से आने वाले लोग मंदिर की प्राचीन कलाकृतियों और प्राकृतिक परिवेश को देखने के साथ यहां की शांति का भी आनंद लेते हैं।

सैकड़ों वर्ष पुरानी मंदिर की कलात्मक सुंदरता आज भी लोगों को आकर्षित करती है। हालांकि पुरातत्व विभाग के अधीन होने के बावजूद मंदिर की सुरक्षा और संरक्षण को लेकर पर्याप्त व्यवस्था नहीं होने की शिकायतें सामने आती रही हैं। स्थानीय लोगों की मांग पर कुछ कार्य कराए जा रहे हैं, लेकिन इस ऐतिहासिक धरोहर के संरक्षण के लिए अभी व्यापक प्रयासों की आवश्यकता महसूस की जा रही है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि मढ़ीबाह मंदिर केवल पूजा का स्थल नहीं, बल्कि क्षेत्र के गौरवशाली सांस्कृतिक और स्थापत्य इतिहास की जीवंत पहचान है। इसलिए आने वाली पीढ़ियों को इस विरासत से परिचित कराने के लिए मंदिर के संरक्षण, सुरक्षा और मूल स्वरूप को बनाए रखने की दिशा में गंभीर प्रयास किए जाने जरूरी हैं।

हिन्दुस्थान समाचार / सुरेन्‍द्र त्रिपाठी

Share this story