उज्जैन: गुरूवार को मां सरस्वती को चढ़ेगी नीली स्याही की धार



उज्जैन: गुरूवार को मां सरस्वती को चढ़ेगी नीली स्याही की धार


उज्जैन, 25 जनवरी (हि.स.)। उज्जैन में मां सरस्वती का छोटा सा मंदिर है। यह मंदिर छोटा है लेकिन यहां की महिमा इतनी बढ़ी है कि बसंत पंचमी (माघ माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी, जोकि गुरूवार को है) पर कुशाग्र बुद्धिवाले विद्यार्थियों से लेकर कमजोर विद्यार्थी तक यहां आते हैं बुद्धिबल मांगने। इसके लिए वे दो काम करते हैं। पहला नीले रंग की स्याही की धारा मां सरस्वती को चढ़ाते हैं और दूसरा काम पीले रंग के पूष्प अर्पित करते हैं।

जानकारों की माने तो मां सरस्वती के इस मंदिर में यह परंपरा कब से प्रारंभ हुई, पता नहीं। लेकिन वयोवृद्ध ज्योतिषाचार्य पं. आनंदशंकर व्यास के अनुसार उनके पूर्वज भी बताते थे कि उनके जमाने में भी मां सरस्वती की प्रतिमा यहीं स्थापित थी और बसंत पंचमी पर विद्यार्थी कुशाग्र बुद्धिबल प्राप्त करने के लिए नीली स्याही की धारा प्रतिमा पर चढ़ाते थे तथा पीले रंग के पूष्प अर्पित करते थे।

महाकाल मंदिर के सवारी मार्ग पर पानदरिबा नाम से बहुत पुरानी बस्ती है। यहां पर मां सरस्वती का मंदिर है। मंदिर में प्रतिमा पर बसंत पंचमी पर नीले रंग की स्याही की धार चढ़ाने की परंपरा है। यहीं पर 26 जनवरी को विद्यार्थियों की भीड़ जुटेगी। इस दिन बसंत पंचमी पर्व है।

कहां से लाते हैं नीले रंग की स्याही....

एक जमाना था जब बरू पेन और बाद में नीप वाले पेन चलन में थे। उस समय बाजार में नीले रंग की गोलियां मिलती थी किराने की दुकानों पर। पानी की सही मात्रा लेकर गोलियां डाल दी जाती थी। घुलने पर स्याही बन जाती थी। यही स्याही मां सरस्वती को चढ़ाई जाती थी। अब पेन का जमाना खत्म हो गया। बाल पेन और जेल पेन से भी आगे तक तकनीक विकसित हो गई। ऐसे में हर वर्ष मां सरस्वती का पूजन करने, स्याही की धारा चढ़ाने के लिए उक्त मंदिर में जाने वाले विपिन त्रिवेदी बताते हैं अब तो उम्र 55 से अधिक की हो गई। बचपन से युवावस्था तक स्याही की गोली मिल जाती थी। उससे स्याही बनाकर चढ़ाते थे। अब नील पावडर, कच्चा नीला रंग आदि बाजार से लाते हैं और उसे पानी में घोलकर ले जाते हैं धारा चढ़ाने। नई आयु के बच्चे यह बात सुनकर जाते तो हैं लेकिन स्याही कहां मिलेगी, इस उलझन में पीले पूष्प अर्पित करके लौट आते हैं। उनके अनुसार वे परंपरानुसार अपने कॉलेज पढ़ रहे बच्चों के साथ जाएंगे मंदिर में।

हिन्दुस्थान समाचार/ ललित ज्वेल

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