भाषा, संस्कृति के बिना समाज का अस्तित्व खतरे में : स्पीकर

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भाषा, संस्कृति के बिना समाज का अस्तित्व खतरे में : स्पीकर


दुमका, 11 अप्रैल (हि.स.)। सिदो-कान्हू मुर्मू विश्वविद्यालय में संथाली साहित्य के अवसर पर कार्यक्रम का आयोजन हुआ। आयोजन प्रसिद्ध संताली साहित्यकार भैया हांसदक चासा की विशेष स्मृति को समर्पित रहा। इसमें साहित्य, भाषा और संस्कृति के संरक्षण एवं संवर्धन पर चर्चा हुई।

कार्यक्रम में मुख्य अतिथि विधानसभा अध्यक्ष डॉ रबिंद्र नाथ महतो, विशिष्ट अतिथि सांसद नलिन सोरेन और जामा विधायक डॉ लुईस मरांडी उपस्थित रहीं। कार्यक्रम का शुभारंभ भैया हसदक चासा के चित्र पर माल्यार्पण, राष्ट्रीय गीत और कुलगीत से हुआ।

स्वागत भाषण पीजी संथाली विभागाध्यक्ष डॉ सुशील टुडू ने करते हुए कार्यक्रम का रूपरेखा एवं उद्देश्यों पर प्रकाश डाला। इस अवसर पर भैया हसदक चासा की स्मृति पर आधारित विशेष स्मारिका का विमोचन भी किया गया। इस अवसर पर कुलसचिव डॉ राजीव रंजन शर्मा ने संथाली साहित्य के ऐतिहासिक विकास, उसके उत्थान एवं वर्तमान परिदृश्य पर चर्चा करते हुए भैया हसदक चासा के निधन पर गहरी संवेदना व्यक्त करते हुए श्रद्धांजलि अर्पित की। डीएसडब्ल्यू डॉ जैनेंद्र यादव ने कहा कि संथाली भाषा को हमारी संस्कृति और परंपराओं से जोड़ने वाली सशक्त कड़ी है। उन्होंने संताली साहित्यकारों के योगदान को रेखांकित करते हुए विशेष रूप से रघुनाथ मुर्मू के योगदान का उल्लेख किया।

उन्होंने बताया कि विवि यूजी, पीजी एवं पीएचडी स्तर पर संथाली अध्ययन के साथ संथाल कल्चरल स्टडी और संथाली स्पोकन कोर्स के माध्यम से भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए प्रतिबद्ध है।

इस अवसर पर मुख्य अतिथि विधानसभा अध्यक्ष (स्पीकर) डॉ रबिन्द्र नाथ महतो ने मातृभाषा के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि आज हम अपनी जड़ों और भाषा से दूर होते जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि भाषा, संस्कृति और अस्तित्व एक-दूसरे से जुड़े हैं और इनके संरक्षण के बिना समाज का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है।

उन्होंने बताया कि विधानसभा की कार्यवाही को आठ स्थानीय भाषाओं में प्रसारित करने का प्रयास किया गया है, जिसमें संथाली भाषा भी शामिल है। उन्होंने संथाली साहित्य के संरक्षण एवं विस्तार के लिए इसके अन्य भाषाओं में अनुवाद की आवश्यकता पर बल देते हुए सरकार की ओर से शिक्षा को सुलभ बनाने के लिए चलाई जा रही विभिन्न योजनाओं की जानकारी दी। उन्होंने छात्रों को प्रोत्साहित करते हुए कहा कि यदि वे पढ़ना चाहते हैं, तो सरकार हर संभव सहयोग देने के लिए तत्पर है। साथ ही संथाल परगना को एक शैक्षणिक हब बनाने की दिशा में निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं।

वहीं अध्यक्षीय भाषण में प्रभारी कुलपति ने आपसी समन्वय एवं सहयोग से संथाली भाषा-साहित्य के विकास पर बल दिया।

इधर, कार्यक्रम के द्वितीय सत्र साहित्यिक सत्र की शुरुआत सामूहिक नृत्य और गीत से हुई। इस सत्र में ठाकुर प्रसाद मुर्मू, मुलमिन टुड , प्रो प्रमोदनी हांसदाक, बिजय टुडू, मरांगमयी मुर्मू, मसूदी टुडू सहित अन्य विद्वानों और साहित्यकारों ने संताली भाषा-साहित्य के इतिहास, वर्तमान स्थिति, युवा दृष्टिकोण, लोकगीतों की भूमिका एवं ध्वनि-विज्ञान जैसे विषयों पर विचार प्रस्तुत किया। छात्र-छात्राओं ने संताली कविता पाठ, समूह एवं एकल नृत्य एवं संगीत की आकर्षक प्रस्तुतियां दी गईं। मंच संचालन डॉ निर्मल मुर्मू एवं कार्यक्रम का समापन डॉ अमित मुर्मू ने किया।

कार्यक्रम को सफल बनाने में विभागाध्यक्ष डॉ सुशील टुडू, डॉ. अमित मुर्मू, डॉ निर्मल मुर्मू सहित शोधार्थियों और छात्रों रमेश मरांडी, उपेंद्र मरांडी, राजेंद्र मड़ैया, आनंद हेम्ब्रम, दिलीप कुमार टुडू, सुमित्रा मुर्मू, प्रेमलता की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

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हिन्दुस्थान समाचार / नीरज कुमार

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