अनोखी धार्मिक परंपराओं की धरोहर है बाबा नगरी देवघर

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अनोखी धार्मिक परंपराओं की धरोहर है बाबा नगरी देवघर


देवघर, 29 अगस्त (हि.स.)। महादेव की नगरी बाबा धाम देवघर अपनी अनूठी धार्मिक परंपराओं और आध्यात्मिक विरासत के लिए देशभर में प्रसिद्ध है। यहां की कई ऐसी परंपराएं हैं, जो देवघर को अन्य धार्मिक स्थलों से अलग पहचान देती हैं। बाबा बैद्यनाथ मंदिर के शिखरों पर स्थापित पंचशूल जहां मंदिर की विशिष्ट पहचान है, वहीं देवघर मंडल कारा में बंदियों की ओर से बाबा बैद्यनाथ और बाबा बासुकीनाथ के लिए ‘नाग पुष्प मुकुट’ तैयार किए जाने की परंपरा भी अपने आप में अनूठी है।

यह परंपरा केवल धार्मिक आस्था से ही नहीं जुड़ी है, बल्कि इसे अपराध से अध्यात्म और सुधार की ओर बढ़ने की प्रेरणादायक प्रक्रिया के रूप में भी देखा जाता है। देवघर मंडल कारा में बंदियों की ओर से वर्षों से बाबा बैद्यनाथ और बाबा बासुकीनाथ के लिए नाग पुष्प मुकुट तैयार किए जाते हैं। बताया जाता है कि यह परंपरा वर्ष 1911 से चली आ रही है।

सावन पूर्णिमा के पावन अवसर पर देवघर मंडल कारा में इस अनूठी परंपरा का निर्वहन किया गया। जेल में बंदियों की ओर से अपने हाथों से तैयार किए गए दो दिव्य नाग पुष्प मुकुट बाबा बैद्यनाथ और बाबा बासुकीनाथ को अर्पित करने के लिए मंदिर भेजे गए। एक मुकुट तैयार करने में करीब पांच किलो फूलों का इस्तेमाल किया जाता है।

परंपरा के अनुसार मुकुट तैयार होने के बाद उन्हें मंदिर भेजने तक सुरक्षित रखा जाता है। इसके बाद एक मुकुट बाबा बासुकीनाथ मंदिर में श्रृंगार पूजा के लिए सुरक्षाकर्मी के साथ भेजा गया, जबकि दूसरा मुकुट देवघर मंडल कारा के जेलर प्रमोद कुमार सहित अन्य कर्मियों द्वारा बाबा बैद्यनाथ मंदिर पहुंचाया गया।

इस अवसर पर देवघर के प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश कौशल किशोर झा ने नाग पुष्प मुकुट को अपने कंधे पर उठाकर जेल के मुख्य द्वार तक पहुंचाया। यह दृश्य बंदियों के लिए गर्व, सम्मान और सुधार की भावना का प्रतीक बना।

देवघर की यह परंपरा इस बात का संदेश देती है कि आस्था और अध्यात्म व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक बदलाव का माध्यम बन सकते हैं। जेल की चारदीवारी के भीतर तैयार होने वाला यह नाग पुष्प मुकुट अपराध की दुनिया से निकलकर सुधार और आध्यात्मिक जुड़ाव की ओर बढ़ने की एक अनूठी कहानी भी बयां करता है।

बाबा नगरी की ऐसी धार्मिक परंपराएं न केवल श्रद्धालुओं की आस्था को मजबूत करती हैं, बल्कि देवघर की विशिष्ट सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पहचान को भी जीवंत बनाए रखती हैं।

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हिन्दुस्थान समाचार / Anup Kumar Roy

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