सरल हिंदी और पारदर्शी व्यवस्था से ही सुशासन की पहचान : प्रवीण टोप्पो

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सरल हिंदी और पारदर्शी व्यवस्था से ही सुशासन की पहचान : प्रवीण टोप्पो


सरल हिंदी और पारदर्शी व्यवस्था से ही सुशासन की पहचान : प्रवीण टोप्पो


रांची, 14 सितंबर (हि.स.)। झारखंड सरकार के कार्मिक, प्रशासनिक सुधार तथा राजभाषा विभाग की ओर से सोमवार को हिंदी दिवस के अवसर पर एटीआई सभागार में व्याख्यान एवं काव्यपाठ समारोह का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में हिंदी के महत्व, उसकी समृद्ध परंपरा और बदलते समय में उसकी प्रासंगिकता पर वक्ताओं ने विचार रखे।

विभागीय सचिव प्रवीण टोप्पो ने कहा कि सुशासन की असली पहचान सरल हिंदी, सुगम प्रक्रियाओं और पारदर्शी व्यवस्था से होती है। जब सरकारी भाषा आमजन की समझ में आती है तो सरकारी योजनाओं और सेवाओं का लाभ लोगों तक प्रभावी ढंग से पहुंचता है। उन्होंने अधिकारियों और कर्मचारियों से कार्यालयी कामकाज में अनावश्यक जटिल शब्दावली और प्रक्रियाओं को कम करने की अपील की, ताकि नागरिकों के लिए सरकारी व्यवस्था को समझना और उसका लाभ लेना आसान हो।

टोप्पो ने कहा कि तकनीक के इस्तेमाल से शासन में पारदर्शिता बढ़ाई जा रही है। ऑनलाइन सेवाओं, समयबद्ध मामलों के निस्तारण और शिकायतों की निगरानी से सरकारी प्रक्रियाओं को अधिक स्पष्ट और जवाबदेह बनाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि अधिकारियों और कर्मचारियों को जनहित को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए सरल भाषा और स्पष्ट कार्यशैली अपनानी चाहिए। इससे शासन जनता के और करीब आएगा तथा लोगों का भरोसा मजबूत होगा।

कार्यक्रम में हिंदी के कई प्रख्यात कवियों और विद्वानों ने अपनी रचनाओं एवं विचारों के माध्यम से हिंदी की समृद्धि, संवेदनशीलता और व्यापकता को रेखांकित किया। वक्ताओं ने कहा कि हिंदी केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि जनसरोकार और सांस्कृतिक एकता की सशक्त कड़ी है। विभिन्न लोकभाषाओं और बोलियों को आत्मसात करते हुए हिंदी निरंतर समृद्ध हुई है। यही विविधता उसकी व्यापक स्वीकार्यता का आधार है।

वक्ताओं ने कहा कि हिंदी ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान लोगों को जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और आज भी देश की सामाजिक एवं सांस्कृतिक विविधता के बीच संवाद का माध्यम बनी हुई है। हिंदी के विकास में देश की विभिन्न लोकभाषाओं और बोलियों के योगदान को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि हिंदी की शक्ति उसकी समावेशी प्रकृति में निहित है।

वक्ताओं ने कहा कि वैश्विक स्तर पर हिंदी का स्वरूप लगातार विस्तार और परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। दूसरी भाषाओं के शब्दों को आत्मसात करने से हिंदी की अभिव्यक्ति और अधिक व्यापक हुई है। ऐसे में हिंदी को केवल अतीत की विरासत के रूप में देखने के बजाय भविष्य की भाषा के रूप में विकसित करने की जरूरत है। इसके लिए साहित्य, शिक्षा, प्रशासन और तकनीक के क्षेत्र में सामूहिक प्रयास जरूरी हैं।

काव्यपाठ के दौरान कवियों ने सामाजिक सरोकार, राष्ट्रभक्ति, सांस्कृतिक विविधता और समकालीन विषयों पर आधारित रचनाएं प्रस्तुत कीं। उनकी रचनाओं को उपस्थित श्रोताओं ने खूब सराहा। कार्यक्रम में साहित्यकारों, अधिकारियों और विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। समारोह के दौरान हिंदी के प्रचार-प्रसार और संवर्धन के लिए निरंतर प्रयास करने का संकल्प लिया गया।

कार्यक्रम में डॉ. जिंदर सिंह मुंडा, अध्यक्ष, स्नातकोत्तर हिंदी विभाग, डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय; डॉ. केदार सिंह, सेवानिवृत्त प्राध्यापक, विनोबा भावे विश्वविद्यालय; प्रख्यात कवयित्री एवं लेखिका डॉ. वंदना टेटे; डॉ. सावित्री बड़ाईक, सहायक प्राध्यापक, एसएस मेमोरियल महाविद्यालय; डॉ. कुमारी उर्वशी सहित कई हिंदी विद्वान उपस्थित थे।-----------

हिन्दुस्थान समाचार / विकाश कुमार पांडे

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