पतारडीह की लौह नगरी पहचान संकट में, परंपरागत कारीगरों का संघर्ष जारी
देवघर, 29 अप्रैल (हि.स.)। बाबा नगरी देवघर का पतारडीह गांव, जो कभी लौह नगरी के नाम से अपनी अलग पहचान रखता था, आज अपने अस्तित्व को बचाने की जंग लड़ रहा है। एक समय था जब इस गांव की सुबह हथौड़ों की टक-टक से गूंजती थी और यहां तैयार लोहे के सामान देश के विभिन्न हिस्सों में भेजे जाते थे। लेकिन बदलते दौर और आधुनिक मशीनों से बने सस्ते उत्पादों ने पारंपरिक लोहारों की आजीविका पर गहरा असर डाला है। जहां पहले हजारों किलो उत्पादन होता था, वहीं अब 100 से 200 किलो सामान की बिक्री भी मुश्किल हो गई है।
गांव के कारीगर आज भी अपने पूर्वजों की इस कला को जीवित रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। उनके लिए यह केवल रोजगार नहीं, बल्कि उनकी पहचान और विरासत का सवाल है। बावजूद इसके, पूंजी की कमी, बाजार तक सीधी पहुंच का अभाव और पर्याप्त सरकारी सहयोग न मिलने से कई परिवारों को पलायन करना पड़ रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि प्रधानमंत्री विश्वकर्मा योजना का लाभ अभी भी सीमित लोगों तक ही पहुंच पाया है, जबकि अधिकांश कारीगर सहायता से वंचित हैं।
कारीगरों का मानना है कि यदि उन्हें आर्थिक सहायता, आधुनिक उपकरण और बेहतर बाजार उपलब्ध कराया जाए, तो पतारडीह की लौह नगरी की पहचान को फिर से जीवित किया जा सकता है। आज भी गांव में हथौड़ों की गूंज यह संकेत देती है कि संघर्ष जारी है और उम्मीद अब भी बाकी है। वहीं कारीगर पारंपरिक लोहे के सामान बनाना जारी रखे हुए हैं, लेकिन बदलती ग्राहक पसंद और बाजार में आकर्षक, सस्ते विकल्पों की उपलब्धता के कारण इनकी मांग लगातार घट रही है।
ग्रामीणों का कहना है कि अगर उन्हें भी सही मंच और सहयोग मिले, तो वे अपनी कला के दम पर फिर से नई पहचान बना सकते हैं।
---------------
हिन्दुस्थान समाचार / Anup Kumar Roy

