झारखंड में सात माह से मध्याह्न भोजन का अटका बजट
रांची, 29 अक्टूबर (हि.स.)। राज्य के सरकारी विद्यालयों में नौनिहालों की थाली भरने की जिम्मेदारी निभा रहे प्राचार्य इन दिनों गंभीर प्रशासनिक और आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं। पिछले सात महीनों से स्कूलों को मध्याह्न भोजन योजना की राशि आवंटित नहीं की गई है। नौनिहालों को भूखा न रहना पड़े और विभागीय कार्रवाई की गाज न गिरे, इसके लिए प्राचार्य अपने वेतन और उधारी राशन लेकर बच्चों का पेट भर रहे हैं। वहीं, अब विभाग के नए और जटिल नियमों ने (एसनए) उनकी मेहनत की भरपाई पर भी पानी फेर दिया है।
राज्य मुख्यालय की ओर से इस मद की राशि करीब एक माह पूर्व ही सभी जिला कार्यालयों को हस्तांतरित कर दी गई थी। जिलों के माध्यम से यह राशि संबंधित विद्यालयों को आवंटित की जानी थी। प्रक्रिया के अनुसार, प्रत्येक प्रखंड संसाधन केंद्र में प्रखंड शिक्षा प्रसार पदाधिकारी की ओर से वेंडर का पंजीकरण किया जाना है। इसके बाद ही भुगतान की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।
विडंबना यह है कि राजधानी रांची जिले में ही अभी तक किसी भी प्रखंड में विद्यालयों के लिए वेंडर निर्माण की प्रक्रिया शुरू भी नहीं हुई है। प्रशासनिक सुस्ती का सीधा खामियाजा विद्यालयों के प्राचार्यों को भुगतना पड़ रहा है। प्राचार्य की सबसे बड़ी मुश्किल भुगतान की अव्यावहारिक शर्तें हैं।
प्रखंड शिक्षा प्रसार पदाधिकारियों (बीईओ) का स्पष्ट कहना है कि भले ही शिक्षकों ने छह-सात माह तक अपनी जेब से खर्च कर योजना चलाई हो, लेकिन यह राशि सीधे उनके खातों में प्रतिपूर्ति नहीं की जाएगी। भुगतान केवल दुकानदार को होगा और उसे वेंडर बनाया जाएगा।
वहीं जमीनी हकीकत यह है कि ग्रामीण और सुदूर क्षेत्रों में हरी सब्जियां, मसाले और स्थानीय सामग्री दुकानदार और हाट-बाजार से नकद खरीदी जाती हैं, जिनका कोई औपचारिक जीएसटी बिल या वेंडर पंजीकरण संभव नहीं है।
एलपीजी सिलेंडर और राशन दुकानदार महीनों तक उधारी नहीं देते। जब विभाग से समय पर बजट नहीं आता, तो प्राचार्य अपना वेतन मिलते ही इन दुकानदारों का कर्ज चुकाते हैं। वेंडर किसे बनाया जाए, उसकी पात्रता क्या होगी और पिछले महीनों में शिक्षकों की ओर से किए गए नकद खर्च का समायोजन कैसे होगा, इस संबंध में विभाग की ओर से कोई स्पष्ट दिशानिर्देश या आधिकारिक पत्र जारी नहीं किया गया है।
प्राचार्य इस समय दोहरी मुसीबत में फंसे हैं। एक तरफ यदि वे मध्याह्न भोजन बंद करते हैं, तो उन पर विभागीय कार्रवाई और निलंबन का खतरा मंडराता है, दूसरी तरफ यदि वे व्यक्तिगत स्तर पर कर्ज लेकर बच्चों को खाना खिलाते हैं, तो विभाग उनके पैसे लौटाने से साफ इनकार कर रहा है।
इसे लेकर अखिल झारखण्ड प्राथमिक शिक्षक संघ ने इस स्थिति पर रोष व्यक्त किया है।
संघ के मुख्य प्रवक्ता नसीम अहमद ने गुरुवार को बताया कि विभाग की यह कार्यशैली प्राचार्यों के मानसिक और आर्थिक दोहन के समान है। संघ ने चेतावनी दी है कि यदि राशि भुगतान की प्रक्रिया को तत्काल सरल नहीं बनाया गया और शिक्षकों की ओर से खर्च की गई राशि की प्रतिपूर्ति का रास्ता नहीं निकाला गया, तो आने वाले महीने से सभी हेडमास्टर मध्याह्न भोजन संचालन के प्रभार से खुद को अलग कर लेंगे और बाध्य होकर चरणबद्ध आंदोलन का रुख करेंगे।
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हिन्दुस्थान समाचार / Vinod Pathak

