कानून के शिकंजे से कोई नहीं बच पाएगा, सबका जेल जाना तय है : बाबूलाल

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कानून के शिकंजे से कोई नहीं बच पाएगा, सबका जेल जाना तय है : बाबूलाल


रांची, 16 जनवरी (हि.स.)। झारखंड उच्च न्यायालय द्वारा प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के विरुद्ध रांची पुलिस की कार्रवाई पर रोक लगाने और ईडी के क्षेत्रीय कार्यालय की सुरक्षा केंद्रीय सुरक्षा बलों को सौंपने के आदेश को लेकर राज्य के नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने हेमंत सोरेन सरकार पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने इस आदेश को जांच एजेंसियों की कार्रवाई को प्रभावित करने की कोशिश करने वालों के लिए “करारा तमाचा” बताया है।

बाबूलाल मरांडी ने शुक्रवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर पोस्ट करते हुए कहा कि पुलिस के सहारे जांच एजेंसियों को डराने-धमकाने की चाहे जितनी भी कोशिश कर ली जाए, भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई रुकने वाली नहीं है। उन्होंने कहा कि घोटालों और षड्यंत्रों में शामिल पूरा कुनबा कानून के शिकंजे से बच नहीं पाएगा और सभी का जेल जाना तय है। मरांडी ने लोगों से धैर्य रखने की अपील करते हुए कहा कि समय आने पर सच्चाई सबके सामने होगी।

नेता प्रतिपक्ष ने राज्य सरकार की ओर से पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) की नियुक्ति को लेकर नियमावली में किए गए संशोधन पर भी गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार ने उच्चतम न्यायालय के दिशा-निर्देशों का हवाला देते हुए यह तर्क दिया कि कई वरिष्ठ आईपीएस (भारतीय पुलिस सेवा) के अधिकारी केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर होने के कारण उपलब्ध नहीं हैं, इसलिए नियमावली में संशोधन जरूरी था।

मरांडी ने इस तर्क को पूरी तरह भ्रामक बताया। उन्होंने कहा कि वरिष्ठता क्रम में शामिल आईपीएस अधिकारी अनिल पालटा, प्रशांत सिंह और एम.एस. भाटिया में से कोई भी केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर नहीं है। इन अधिकारियों की सेवा अवधि भी क्रमशः एक वर्ष, दो वर्ष और तीन वर्ष शेष है। इसके बावजूद सेवानिवृत्ति से ठीक एक दिन पहले वरीयता क्रम में कनिष्ठ अधिकारी को डीजीपी नियुक्त कर दिया गया।

मरांडी ने आरोप लगाया कि यह नियुक्ति प्रक्रिया उच्चतम न्यायालय के प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ फैसले का सीधा उल्लंघन है, क्योंकि डीजीपी की नियुक्ति संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) के पैनल से नहीं की गई। इसके साथ ही राज्य सरकार द्वारा स्वयं बनाई गई डीजीपी नियुक्ति नियमावली के वरीयता क्रम का भी पालन नहीं किया गया।

नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि डीजीपी पूरे राज्य के पुलिस बल का मुखिया होता है। ऐसे पद पर नियुक्ति में पक्षपात और नियमों की अनदेखी से भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है और ट्रांसफर-पोस्टिंग में लेन-देन की प्रवृत्ति मजबूत होती है।

उन्होंने अनुराग गुप्ता के मामले का उल्लेख करते हुए कहा कि उनकी नियुक्ति के लिए सभी नियम-कायदों को ताक पर रख दिया गया। एसीबी और सीआईडी का प्रभार सौंपकर अपने खिलाफ चल रही भ्रष्टाचार की जांच को प्रभावित करने का प्रयास किया गया, लेकिन अंततः परिस्थितियां ऐसी बनीं कि उन्हें रातों-रात हटाना पड़ा।

बाबूलाल मरांडी ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से अपील करते हुए कहा कि संवैधानिक प्रावधानों और न्यायालय के दिशा-निर्देशों का सम्मान किया जाना चाहिए, ताकि प्रशासनिक व्यवस्था में पारदर्शिता बनी रहे और जनता का विश्वास कायम रह सके।--------------

हिन्दुस्थान समाचार / विकाश कुमार पांडे

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