श्रेष्ठ कर्म और जनकल्याण का मार्ग है यज्ञ-स्वामी राम स्वरूप जी
कठुआ, 22 मई (हि.स.)। वेद मन्दिर योल में चल रहे 78 दिवसीय चारों वेदों के यज्ञानुष्ठान के 41वें दिन स्वामी राम स्वरूप जी योगाचार्य ने यजुर्वेद के प्रथम मन्त्र (1/1) का गूढ़ अर्थ समझाते हुए कहा कि प्रत्येक मनुष्य को अपने जीवन में श्रेष्ठ कर्मों के उत्तम फल की प्राप्ति हेतु यज्ञ के माध्यम से ईश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए।
उन्होंने बताया कि परमेश्वर समस्त सृष्टि का रचयिता और सुखों का दाता है। इसलिए मनुष्य को अपनी इन्द्रियों, अंतःकरण और प्राणों को वेदों में बताए गए कर्तव्यों के अनुसार यज्ञमय जीवन से जोड़ना चाहिए। जीवन का प्रत्येक क्षण श्रेष्ठ कर्मों और यज्ञ भावना के साथ व्यतीत करना ही मानव जीवन का वास्तविक उद्देश्य है। स्वामी जी ने कहा कि चारों वेदों में यज्ञ को समस्त जीवों के लिए हितकारी और कल्याणकारी बताया गया है। यजुर्वेद के इस मन्त्र में मनुष्य ईश्वर से अन्न, ऊर्जा, धन, ज्ञान और शुभ संकल्पों की प्राप्ति के लिए उसकी शरण में जाने की प्रार्थना करता है। उन्होंने आगे कहा कि मनुष्य को ईश्वर से स्वस्थ, रोगमुक्त समाज, अहिंसा से युक्त जीवन और गौ व अन्य पशुओं की रक्षा की कामना करनी चाहिए। साथ ही समाज में पाप, चोरी और दुष्ट प्रवृत्तियों का नाश हो, यह भी प्रार्थना का महत्वपूर्ण भाग है।
स्वामी राम स्वरूप जी ने स्पष्ट किया कि यजुर्वेद का यह मन्त्र स्वयं ईश्वर द्वारा प्रदत्त प्रार्थना है, जो मनुष्य को सच्चे सुख की प्राप्ति का मार्ग दिखाता है। उन्होंने कहा कि वेद ज्ञान प्राप्त करने के लिए आचार्य के पास जाकर अध्ययन करना तथा यज्ञ में सम्मिलित होकर मन्त्रों की आहुति देना ही जनकल्याण का सर्वोत्तम उपाय है। कार्यक्रम में उपस्थित श्रद्धालुओं ने वैदिक शिक्षाओं को आत्मसात करने और यज्ञमय जीवन अपनाने का संकल्प लिया।
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हिन्दुस्थान समाचार / सचिन खजूरिया

