यज्ञ है दिव्य जीवन का मार्ग-स्वामी रामस्वरूप जी
कठुआ, 18 अप्रैल (हि.स.)। वेद मंदिर योल में स्वामी रामस्वरूप जी योगाचार्य के नेतृत्व में चारों वेदों पर आधारित 78 दिवसीय यज्ञ का आयोजन किया जा रहा है। इस दौरान श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए स्वामी जी ने मानव जीवन में यज्ञ के महत्व को अत्यंत आवश्यक बताया।
उन्होंने कहा कि “यज्ञ” शब्द संस्कृत धातु ‘यज’ से बना है जिसका अर्थ है ईश्वर की उपासना, एकता और दान। स्वामी जी ने बताया कि मानव जीवन में चार प्रमुख देव होते हैं माता, पिता, अतिथि और आचार्य। तैत्तिरीय उपनिषद में वर्णित “मातृ देवो भव, पितृ देवो भव, आचार्य देवो भव, अतिथि देवो भव” का संदेश देते हुए उन्होंने इन चारों के प्रति सेवा और सम्मान को जीवन का मूल कर्तव्य बताया। स्वामी रामस्वरूप जी ने कहा कि “देव” का अर्थ केवल ईश्वर ही नहीं बल्कि वह भी है जो निःस्वार्थ भाव से देता है। उन्होंने बताया कि माता जन्म देकर, पिता पालन-पोषण कर, अतिथि ज्ञान देकर और आचार्य मार्गदर्शन कर जीवन को संवारते हैं इसलिए ये सभी देवतुल्य हैं।
उन्होंने शास्त्रों का उल्लेख करते हुए कहा कि यज्ञ केवल एक धार्मिक कर्मकांड नहीं बल्कि शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक उन्नति का संपूर्ण साधन है। शतपथ ब्राह्मण के अनुसार “यज्ञ ही सर्वव्यापी परमात्मा है।” वहीं यजुर्वेद के मंत्र “आयुः यज्ञेन कल्पताम३” का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि नियमित यज्ञ करने से आयु, सुख-समृद्धि और स्वास्थ्य में वृद्धि होती है। स्वामी जी ने अग्निहोत्र को दैनिक जीवन में अपनाने का आह्वान करते हुए कहा कि यह वेदों का दिव्य आदेश है, जो मनुष्य को सुख, शांति और समृद्धि प्रदान करता है। उन्होंने सभी श्रद्धालुओं से आग्रह किया कि वे यज्ञ को ईश्वर का प्रत्यक्ष स्वरूप मानते हुए सामूहिक रूप से आहुति देकर जीवन को संतुलित और सफल बनाएं।
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हिन्दुस्थान समाचार / सचिन खजूरिया

