सृष्टि का पहला दिन किसने देखा-योल में गूंजा आध्यात्मिक प्रश्न

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सृष्टि का पहला दिन किसने देखा-योल में गूंजा आध्यात्मिक प्रश्न


कठुआ, 14 जून (हि.स.)। वेद मंदिर योल में चल रहे 78 दिवसीय चारों वेदों के महायज्ञानुष्ठान के 64वें दिन स्वामी राम स्वरूप जी योगाचार्य ने श्रद्धालुओं को अथर्ववेद मंत्र 18/1/7 का गूढ़ मर्म समझाते हुए सृष्टि के आरंभ से जुड़े महत्वपूर्ण आध्यात्मिक प्रश्नों पर प्रकाश डाला।

अपने प्रवचन में उन्होंने बताया कि मंत्र में यह प्रश्न उठता है कि सृष्टि के प्रथम दिन को किसने देखा और उसके विषय में कौन बता सकता है। इसका उत्तर देते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि सृष्टि के आरंभ का प्रत्यक्ष साक्षी कोई भी जीव नहीं रहा, इसलिए इस विषय का पूर्ण ज्ञान केवल परमात्मा को ही है। उन्होंने आगे ऋग्वेद मंत्र 10/129/1-7 तथा सांख्य शास्त्र के आधार पर समझाया कि जब जड़ प्रकृति में परमात्मा की सूक्ष्म शक्ति सक्रिय होती है, तभी सम्पूर्ण सृष्टि की रचना होती है। यह सृष्टि पालन और संहार का चक्र अनादि काल से निरंतर चलता आ रहा है और अविनाशी है। स्वामी जी ने बताया कि सृष्टि के प्रारंभ में उत्पन्न मानव अज्ञान अवस्था में होते हैं तथा उन्हें ज्ञान देने के लिए कोई गुरु उपलब्ध नहीं होता। उस समय स्वयं परमेश्वर की कृपा से चारों वेद अग्नि, वायु, आदित्य और अंगिरा ऋषियों के हृदय में प्रकट होते हैं। यही चारों ऋषि प्रथम गुरु बनते हैं और उनसे प्राप्त ज्ञान को ब्रह्मा द्वारा गुरु-शिष्य परंपरा के माध्यम से समाज तक पहुंचाया जाता है। उन्होंने अथर्ववेद के आधार पर परमेश्वर को सर्वशक्तिमान, निराकार और अनंत गुणों से युक्त बताते हुए कहा कि मनुष्य को उसी एक परमात्मा की उपासना करनी चाहिए। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि मनुष्य वेदसम्मत मार्ग को छोड़कर अन्य मानवीय परंपराओं का अनुसरण करता है, तो उसे सुख-शांति से वंचित होना पड़ता है। प्रवचन के अंत में उन्होंने श्रद्धालुओं से वेद मार्ग अपनाकर जीवन में शांति शक्ति और सद्गुणों को विकसित करने का आह्वान किया।

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हिन्दुस्थान समाचार / सचिन खजूरिया

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