जम्मू में डुग्गर संस्कृति का पावन पर्व ‘भुग्गा व्रत’ 6 जनवरी को श्रद्धा से मनाया जाएगा, संकष्ट चतुर्थी पर माताएं संतान की मंगलकामना हेतु रखेंगी कठोर व्रत

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जम्मू में डुग्गर संस्कृति का पावन पर्व ‘भुग्गा व्रत’ 6 जनवरी को श्रद्धा से मनाया जाएगा, संकष्ट चतुर्थी पर माताएं संतान की मंगलकामना हेतु रखेंगी कठोर व्रत


जम्मू, 04 जनवरी (हि.स.)। डुग्गर संस्कृति में श्रीगणेश संकष्ट चतुर्थी, जिसे स्थानीय रूप से भुग्गा व्रत कहा जाता है का विशेष धार्मिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व है। इस संबंध में श्री कैलख ज्योतिष एवं वैदिक संस्थान ट्रस्ट, रायपुर (ठठर), जम्मू–कश्मीर के अध्यक्ष महंत रोहित शास्त्री (ज्योतिषाचार्य) ने जानकारी देते हुए बताया कि यह व्रत माघ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को किया जाता है और जम्मू क्षेत्र में इसे परंपरागत श्रद्धा के साथ माताएं अपनी संतानों की रक्षा, दीर्घायु और सुख-समृद्धि के लिए करती हैं।

महंत रोहित शास्त्री ने बताया कि माघ कृष्ण चतुर्थी तिथि 6 जनवरी 2026, मंगलवार को प्रातः 8:02 बजे से प्रारंभ होकर 7 जनवरी, बुधवार को प्रातः 6:53 बजे तक रहेगी। तिथि को लेकर भ्रम की स्थिति रहती है, लेकिन शास्त्रों के अनुसार संकष्टी चतुर्थी में चंद्रदर्शन को विशेष महत्व दिया गया है। चूंकि जम्मू में चंद्रोदय 6 जनवरी को रात्रि 9:05 बजे चतुर्थी तिथि में हो रहा है, इसलिए इसी दिन भुग्गा व्रत करना शास्त्रसम्मत और फलदायी माना गया है।

इस व्रत में महिलाएं दिनभर निराहार और निर्जल रहकर रात्रि में श्रीगणेश पूजन करती हैं तथा चंद्रमा को अर्घ्य अर्पित करने के बाद ही व्रत का पारण करती हैं। पूजन में तिल और गुड़ से बने भुग्गे का विशेष महत्व है, जिसे घर में स्वयं बनाना शुभ और शगुनकारी माना जाता है। व्रत के दौरान ‘ॐ श्रीगणेशाय नमः’ मंत्र का 108 बार जाप किया जाता है। बच्चों के नाम का भुग्गा अलग निकालकर मूली और गन्ने सहित कुल पुरोहित एवं कन्याओं को दान देने की परंपरा भी डुग्गर संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस व्रत के प्रभाव से संतान संबंधी कष्ट दूर होते हैं और परिवार में सुख, शांति व समृद्धि का वास होता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार महाभारत काल में धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण की प्रेरणा से सबसे पहले यह व्रत किया था। डुग्गर समाज में यह व्रत ऋतु परिवर्तन से भी जुड़ा माना जाता है और मान्यता है कि इसके बाद शीत ऋतु की तीव्रता में धीरे-धीरे कमी आने लगती है।

महंत रोहित शास्त्री ने यह भी स्पष्ट किया कि वर्तमान में शुक्र तारा अस्त होने के कारण भुग्गा व्रत का उद्यापन (मोख) वर्जित रहेगा। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार गुरु और शुक्र के अस्त काल में विवाह, गृहप्रवेश, मुंडन, शिलान्यास और व्रत उद्यापन जैसे सभी शुभ कार्य निषिद्ध माने जाते हैं। ऐसे में श्रद्धालुओं से शास्त्रीय मर्यादाओं का पालन करते हुए व्रत करने की अपील की गई है।

हिन्दुस्थान समाचार / राहुल शर्मा

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