वेद मार्ग ही मानवता का सच्चा पथ, सभी के लिए समान उपासना का अधिकार-स्वामी राम स्वरूप जी
कठुआ, 09 मई (हि.स.)। वेद मन्दिर योल में चल रहे 78 दिवसीय चारों वेदों के यज्ञानुष्ठान के 28वें दिन स्वामी राम स्वरूप योगाचार्य ने श्रद्धालुओं को वैदिक ज्ञान का महत्व समझाते हुए कहा कि परमेश्वर सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापक और सृष्टि के रचयिता हैं जिनकी उपासना का अधिकार सभी नर-नारियों को समान रूप से है।
स्वामी जी ने ऋग्वेद मन्त्र 7/67/8 के संदर्भ में बताया कि वर्तमान समय में मनुष्यों द्वारा बनाए गए जाति-आधारित भेदभावपूर्ण नियम वेदों के विरुद्ध हैं और ईश्वर को अप्रसन्न करने वाले हैं। उन्होंने सभी से आह्वान किया कि वे वेद विद्या को समझकर प्रेम, एकता और शुभ कर्मों के साथ जीवन व्यतीत करें तथा एक परमात्मा की उपासना करें। उपासना के विषय में उन्होंने उपनिषदों के अनुसार श्रवण, मनन और निदिध्यासन को आवश्यक बताया। सामवेद के मन्त्र “श्रुधि श्रुत्कर्ण” का उल्लेख करते हुए कहा कि मनुष्य को वेदों का श्रवण करना चाहिए, फिर उसके अर्थ पर विचार (मनन) कर उसे जीवन में धारण करना (निदिध्यासन) ही सच्ची साधना है।
अथर्ववेद मन्त्र 1/1/4 का उल्लेख करते हुए स्वामी जी ने कहा कि वेद श्रवण कभी नहीं छोड़ना चाहिए। उन्होंने खेद व्यक्त किया कि आज अधिकांश लोग वेदों का ज्ञान सुनने के बावजूद उसे जीवन में अपनाते नहीं हैं। महाभारत के प्रसंग का उल्लेख करते हुए स्वामी जी ने बताया कि युधिष्ठिर ने यक्ष के प्रश्न “कः पन्थाः?” का उत्तर देते हुए कहा था कि महापुरुषों द्वारा अपनाया गया मार्ग ही श्रेष्ठ होता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि प्राचीन काल से ऋषि-मुनि केवल वेद मार्ग पर चलकर ही मोक्ष को प्राप्त करते आए हैं। स्वामी राम स्वरूप ने अंत में कहा कि वेदों को प्रमाण मानकर ही सत्य जीवन जीया जा सकता है और यही मार्ग मानव कल्याण का आधार है।
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हिन्दुस्थान समाचार / सचिन खजूरिया

