योग-आत्मसंयम से आत्मविजय तक की यात्रा (लेखिका पूनम झा)

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योग-आत्मसंयम से आत्मविजय तक की यात्रा (लेखिका पूनम झा)


कठुआ, 26 जून (हि.स.)। योग केवल शारीरिक व्यायाम नहीं बल्कि जीवन को सही दिशा देने वाली एक गहन और महान साधना है। आज के समय में अधिकांश लोग योग को केवल शरीर को स्वस्थ रखने का माध्यम मानते हैं जबकि योग का वास्तविक उद्देश्य इससे कहीं अधिक व्यापक और गहरा है। यह आत्मसंयम, आत्मशुद्धि और अंततः आत्मविजय का मार्ग है।

व्यायाम और योग के बीच मूलभूत अंतर को समझना आवश्यक है। व्यायाम शरीर को सशक्त, चुस्त और ऊर्जावान बनाता है जबकि योग मन, बुद्धि और इंद्रियों को नियंत्रित करना सिखाता है। योग का लक्ष्य केवल बाहरी स्वास्थ्य नहीं बल्कि आंतरिक संतुलन और शांति प्राप्त करना है। जिसने अपने मन और इंद्रियों पर विजय प्राप्त कर ली, वही सच्चे अर्थों में योगी कहलाता है। मानव जीवन में पाँच इंद्रियाँ आँख, कान, नाक, जीभ और त्वचाकृनिरंतर बाहरी संसार की ओर आकर्षित करती हैं। योग हमें इन इंद्रियों पर संयम रखना सिखाता है। आँखें सब कुछ देखें पर मन विचलित न होय कान सब कुछ सुनें पर केवल सत्य को स्वीकार करें, जीभ स्वाद ले पर लालसा में न फँसे, यही योग का सार है। इंद्रियों का यह संतुलन ही व्यक्ति को आंतरिक शांति की ओर ले जाता है।

योग साधना में ध्यान का विशेष महत्व है। शांत मन से बैठकर भौहों के मध्य ध्यान केंद्रित करना और ‘ॐ’ का स्मरण करना मन को स्थिर बनाता है। नियमित अभ्यास से मन की चंचलता कम होती है और विचारों में स्पष्टता व शुद्धता आती है। यही अवस्था व्यक्ति को आत्मबोध के करीब ले जाती है। मनुष्य के अंतःकरण में मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार प्रमुख तत्व माने गए हैं। इनमें मन सबसे चंचल होता है जो इंद्रियों को नियंत्रित करता है। यदि मन को साध लिया जाए तो जीवन की अनेक समस्याएँ स्वतः समाप्त हो जाती हैं। यही कारण है कि योग का मुख्य उद्देश्य मन को वश में करना है। हालांकि यह मार्ग सरल नहीं है इसके लिए निरंतर अभ्यास, धैर्य और दृढ़ संकल्प आवश्यक है। योग केवल संन्यासियों के लिए नहीं बल्कि हर व्यक्ति के लिए उपयोगी है।

गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी योग का पालन किया जा सकता है। अपने कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक पालन करते हुए सत्य और धर्म के मार्ग पर चलते हुए व्यक्ति कर्मयोग के माध्यम से योग का अभ्यास कर सकता है। जब योग जीवन का हिस्सा बन जाता है तो व्यक्ति के विचार, वाणी और आचरण में सकारात्मक परिवर्तन आने लगता है। मन शांत होता है, बुद्धि निर्मल होती है और इच्छाओं पर नियंत्रण स्थापित होने लगता है। यह अवस्था व्यक्ति को आत्मिक उन्नति की ओर ले जाती है और उसे परम सत्य के निकट पहुँचाती है।

भारत योग की जन्मभूमि रहा है। प्राचीन काल में ऋषि-मुनियों ने योग के माध्यम से जीवन के गूढ़ रहस्यों को जाना। महर्षि पतंजलि ने योग को व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत किया जिससे यह एक वैज्ञानिक और अनुशासित पद्धति के रूप में स्थापित हुआ। आधुनिक युग में स्वामी विवेकानंद ने योग को विश्व स्तर पर पहचान दिलाई और इसकी महत्ता को जन-जन तक पहुँचाया। आज योग वैश्विक स्तर पर अपनाया जा रहा है। 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के रूप में मनाया जाना इसकी विश्वव्यापी स्वीकृति का प्रमाण है। यह केवल एक दिवस नहीं बल्कि एक जीवनशैली है जिसे अपनाकर हम शारीरिक, मानसिक और आत्मिक संतुलन प्राप्त कर सकते हैं। अंततः योग हमें स्वयं से जोड़ता है और आत्मज्ञान की ओर अग्रसर करता है। यह बाहरी दिखावे की नहीं बल्कि आंतरिक परिवर्तन की साधना है। यदि इसे नियमित और ईमानदारी से अपनाया जाए तो जीवन में शांति, संतुलन और सच्चा सुख प्राप्त किया जा सकता है।

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हिन्दुस्थान समाचार / सचिन खजूरिया

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