वेद मन्दिर योल में 78 दिवसीय यज्ञानुष्ठान का 55वां दिन, स्वामी राम स्वरूप ने दिया आध्यात्मिक संदेश

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वेद मन्दिर योल में 78 दिवसीय यज्ञानुष्ठान का 55वां दिन, स्वामी राम स्वरूप ने दिया आध्यात्मिक संदेश


कठुआ, 05 जून (हि.स.)। वेद मन्दिर योल में चल रहे 78 दिवसीय चारों वेदों के यज्ञानुष्ठान के 55वें दिन श्रद्धालुओं को स्वामी राम स्वरूप जी, योगाचार्य ने अथर्ववेद के गूढ़ ज्ञान से अवगत कराया।

स्वामी जी ने अथर्ववेद काण्ड 4 सूक्त 16 का उल्लेख करते हुए बताया कि “द्याम् परस्तात् अति सर्पात्” अर्थात यदि कोई व्यक्ति इस पृथ्वी से परे द्युलोक सूर्य, चंद्रमा और तारों से भी आगे निकल जाए तब भी वह परमेश्वर के बंधन से मुक्त नहीं हो सकता। उन्होंने स्पष्ट किया कि परमेश्वर इस समस्त ब्रह्माण्ड और उससे परे भी कण-कण में विद्यमान है। उन्होंने आगे बताया कि उक्त सूक्त के मंत्र 1, 2 और 3 में यह उपदेश दिया गया है कि परमेश्वर प्रत्येक प्राणी के कर्मों को अत्यंत निकट से देखता है। अज्ञानवश मनुष्य यह समझ बैठता है कि वह अकेले में किए गए पापों को कोई नहीं देख रहा जबकि सत्य यह है कि प्रभु सब कुछ देख रहे हैं चाहे व्यक्ति खड़ा हो, चल रहा हो, किसी को धोखा दे रहा हो या छिपकर कोई कार्य कर रहा हो।

स्वामी राम स्वरूप जी ने कहा कि परमेश्वर मनुष्य के हर विचार, यहां तक कि पलक झपकने तक को जानता है और पाप करने वाले को उसके कर्मों के अनुसार दंड देता है। उन्होंने यजुर्वेद मंत्र 40/1 का उल्लेख करते हुए बताया कि परमेश्वर चेतन जीवात्माओं और जड़ जगत के भीतर और बाहर सर्वत्र विद्यमान है। उन्होंने कहा कि जब मनुष्य वेद साधना के माध्यम से परमेश्वर के इस स्वरूप को समझ लेता है तब वह पाप कर्मों से स्वयं ही दूर हो जाता है और धर्ममय जीवन अपनाता है। इस अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे और यज्ञानुष्ठान में सहभागिता की।

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हिन्दुस्थान समाचार / सचिन खजूरिया

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