कश्मीरी पंडित नरसंहार दिवस के 37वें अवसर पर पनुन कश्मीर ने आज जम्मू में एक महत्वपूर्ण बैठक का आयोजन किया
जम्मू, 17 जनवरी (हि.स.)। कश्मीरी पंडित नरसंहार दिवस के 37वें अवसर पर पनुन कश्मीर ने आज जम्मू में एक महत्वपूर्ण बैठक का आयोजन किया, बैठक की अध्यक्षता महासचिव (संगठन) कमल बागाती ने की और इसमें एच.एल.जलाली, जे.एल. कौल, पी.के. भान, के1, वी.के. मट्टू, समीर भट और सिंह सहित अन्य प्रमुख नेता उपस्थित थे। भाजपा और कश्मीरी पंडितों के वरिष्ठ नेता अश्वनी कुमार चुंगू विशेष अतिथि वक्ता के रूप में सत्र में शामिल हुए।
बैठक में विस्थापित कश्मीरी पंडित समुदाय के वर्तमान सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य पर चर्चा हुई और समुदाय ने अपने अस्तित्व के संघर्ष की मशाल को लक्ष्य प्राप्ति तक प्रज्वलित रखने के अपने संकल्प को दोहराया। बैठक में यह कहा गया कि कश्मीरी पंडित समुदाय इस संकल्प के प्रति प्रतिबद्ध है कि वह कश्मीर घाटी में 1986 से इस्लामी कट्टरपंथी तत्वों द्वारा किए गए अत्याचारों को न तो भूलेगा और न ही क्षमा करेगा।
समुदाय के नरसंहार की पृष्ठभूमि में कश्मीर की मस्जिदों ने विनाशकारी भूमिका निभाई और अपने सार्वजनिक संबोधन प्रणालियों पर रालिव-चालिव-गालिव के नारे लगाकर अल्पसंख्यकों को धमकाया। कश्मीरी पंडित समुदाय के पुनर्वास का मूल प्रश्न अभी भी बना हुआ है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि भारत सरकार ने 5 अगस्त 2019 को ऐतिहासिक मार्गदर्शन प्रस्ताव के एक बड़े हिस्से को लागू किया। यह जम्मू और कश्मीर के संदर्भ में एक क्रांतिकारी कदम था जिसने कश्मीर के निर्वासित हिंदू समुदाय के पुनर्वास के बिना जम्मू और कश्मीर में कई सकारात्मक संवैधानिक, प्रशासनिक और राजनीतिक परिवर्तन लाए।
राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक हलकों के कई महत्वपूर्ण लोगों का मानना है कि इन परिवर्तनों के परिणामस्वरूप घाटी में सामाजिक, सांस्कृतिक और जनसांख्यिकीय संतुलन के स्तर पर भी परिवर्तन होंगे।
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हिन्दुस्थान समाचार / रमेश गुप्ता

