पश्चिम एशिया में तनाव के बीच जम्मू-कश्मीर में बिजली क्षेत्र पर भी आ सकता है संकट
जम्मू, 18 मार्च (हि.स.)। पश्चिम एशिया में अमेरिका और इज़राइल के ईरान पर संयुक्त हमले के बीच बढ़ते तनाव ने जम्मू और कश्मीर में भी ऊर्जा सुरक्षा पर असर डालना शुरू कर दिया है, जिसका असर एलपीजी उपलब्धता और बिजली क्षेत्र पर पड़ सकता है।
पावरग्रिड के एक पूर्व अधिकारी के अनुसार चल रहे संघर्ष ने रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य के माध्यम से शिपिंग मार्गों को बाधित कर दिया है, जो भारत के लगभग दो-तिहाई एलपीजी आयात को संभालता है। देश की लगभग 60-65 फीसदी एलपीजी आपूर्ति इस गलियारे पर निर्भर है। इस व्यवधान ने घरेलू बाजारों में आपूर्ति संबंधी चिंताओं को जन्म दिया है। वैकल्पिक खाना पकाने के समाधानों की मांग में वृद्धि हुई है और एलपीजी की कमी की आशंकाओं के बीच घरों में इंडक्शन स्टोव और अन्य बिजली के उपकरणों की ओर रुख बढ़ रहा है। इस अचानक व्यवहारिक बदलाव से भारत के पहले से ही विस्तारित बिजली बुनियादी ढांचे पर अतिरिक्त दबाव पड़ने की उम्मीद है।
अधिकारियों का कहना है कि जम्मू और कश्मीर अपनी सीमित स्थानीय उत्पादन क्षमता के साथ राष्ट्रीय ग्रिड से बिजली आयात पर बहुत अधिक निर्भर है। श्रीनगर और जम्मू जैसे शहरी केंद्रों में भी पीक आवर्स के दौरान अस्थायी ग्रिड तनाव देखा जा सकता है। राष्ट्रीय स्तर पर बिजली से खाना पकाने की दिशा में निरंतर बदलाव से बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए कोयला आधारित बिजली उत्पादन पर निर्भरता बढ़ सकती है, जिससे संभावित रूप से कार्बन उत्सर्जन और बिजली शुल्क बढ़ सकते हैं। इसके परिणामस्वरूप जम्मू-कश्मीर में काम करने वाली कंपनियों सहित बिजली वितरण कंपनियों की वित्तीय स्थिति खराब हो सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इलेक्ट्रिक खाना पकाने की ओर बदलाव भारत के व्यापक स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण लक्ष्यों के अनुरूप हो सकता है। आयातित एलपीजी पर कम निर्भरता, घरेलू स्तर पर उत्पादित बिजली के बढ़ते उपयोग के साथ मिलकर, मजबूत बुनियादी ढांचे और नवीकरणीय एकीकरण द्वारा समर्थित होने पर दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा को बढ़ा सकती है। जैसे-जैसे भू-राजनीतिक स्थिति विकसित हो रही है, भारत की अपनी ऊर्जा प्रणालियों को तेजी से अनुकूलित करने की क्षमता स्थिरता बनाए रखने में महत्वपूर्ण होगी। जम्मू और कश्मीर के लिए आने वाले महीनों में बड़े पैमाने पर व्यवधानों से बचने के लिए लक्षित हस्तक्षेप और बुनियादी ढांचे का उन्नयन आवश्यक साबित हो सकता है।
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हिन्दुस्थान समाचार / राधा पंडिता

