यदि शारदा ने समाज की बुद्धिमत्ता को पोषित किया तो संसद ने राष्ट्र की आकांक्षाओं को पूरा करने का कार्य किया है: उपराज्यपाल सिन्हा
उपराज्यपाल ने डॉ. ए.एच. शाह की पुस्तक “शारदा से संसद” का किया विमोचन
श्रीनगर, 02 अगस्त (हि.स.)।उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने आज डॉ. ए.एच. शाह द्वारा लिखित पुस्तक “शारदा से संसद” के विमोचन में भाग लिया। उपराज्यपाल ने डॉ. शाह को उनके विद्वतापूर्ण योगदान के लिए हार्दिक बधाई दी। उपराज्यपाल ने पुस्तक को केवल इतिहास का वृत्तांत ही नहीं बल्कि विरासत और आशा, अतीत के ज्ञान और वर्तमान की लोकतांत्रिक आकांक्षाओं के बीच एक सार्थक संवाद बताया।
इस अवसर पर अपने संबोधन में उपराज्यपाल ने पहाड़ी समुदाय की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, उनकी गौरवशाली संस्कृति और सदियों से परंपराओं को संरक्षित रखने के उनके दृढ़ संकल्प पर प्रकाश डाला। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि पुस्तक शारदा पीठ की प्राचीन सभ्यता की निरंतरता और आधुनिक भारत की लोकतांत्रिक संस्थाओं की जीवंतता पर एक नया दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है।
इतिहास, सभ्यता और संस्कृति से संबंधित पुस्तकें अक्सर पीढ़ियों के बीच सेतु का काम करती हैं। शारदा से संसद के माध्यम से डॉ. शाह ने ऐसा ही एक सेतु बनाया है जो हमें याद दिलाता है कि इतिहास और संस्कृति कभी वास्तव में लुप्त नहीं होते। वे हमारे भीतर जीवित रहते हैं
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उपराज्यपाल ने इस बात पर भी प्रकाश डाला कि साहित्य और विद्वता किस प्रकार मानवीय भावना को प्रकाशित करते हैं और विभिन्न युगों को जोड़ते हैं। उन्होंने प्राचीन विद्या केंद्र शारदा पीठ और आधुनिक भारत में सामूहिक चेतना के प्रतीक संसद के बीच एक सशक्त समानता स्थापित की।
उन्होंने कहा कि अगर शारदा ने समाज की बुद्धिमत्ता को पोषित किया तो संसद ने राष्ट्र की आकांक्षाओं को पूरा करने का काम किया है।
उपराज्यपाल ने अनुच्छेद 370 के निरसन के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में हुए ऐतिहासिक परिवर्तन का अवलोकन किया जिसने जम्मू कश्मीर की आकांक्षाओं को राष्ट्र की आकांक्षाओं से जोड़ा। उन्होंने कहा कि अन्य हाशिए पर पड़े समूहों के साथ-साथ पहाड़ी समुदाय का सशक्तिकरण भारत के लोकतांत्रिक सफर में एक महत्वपूर्ण मोड़ है।
आने वाली पीढ़ियां इस परिवर्तन को अच्छी तरह याद रखेंगी।
भारत की सभ्यतागत विरासत पर विचार करते हुए उपराज्यपाल ने कहा कि भारत की शक्ति हमेशा से उसके बौद्धिक आत्मविश्वास, प्रश्न पूछने के साहस और संवाद की संस्कृति में निहित रही है। उन्होंने नालंदा, तक्षशिला और विक्रमशिला जैसे ज्ञान केंद्रों को याद किया जिन्होंने कभी दुनिया को रोशन किया था और इस बात पर जोर दिया कि इमारतें भले ही नष्ट हो जाएं लेकिन भारतीय सभ्यता में ज्ञान की खोज शाश्वत है।
उपराज्यपाल ने पहाड़ी समुदाय की उनकी भाषा, लोककथाओं, लोक संगीत और परंपराओं को गरिमा और धैर्य के साथ संरक्षित करने के लिए प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि उनका मौखिक साहित्य और समृद्ध परंपराएं साहस, सद्भाव और मानवीय मूल्यों की सशक्त अभिव्यक्ति हैं।
“शारदा से संसद तक का सफर केवल एक समुदाय का सफर नहीं है बल्कि यह स्वयं भारत का सफर है। यह एक ऐसी सभ्यता का सफर है जिसने अपनी प्राचीन ज्ञान परंपरा को लोकतंत्र की संस्थाओं में समाहित किया और दोनों में अपनी आस्था को समान रूप से बरकरार रखा। मेरा मानना है कि संस्कृति एक जीवंत शक्ति है। प्रत्येक पीढ़ी सांस्कृतिक विरासत को विरासत के रूप में प्राप्त करती है और उसे अपनी विशिष्ट पहचान के साथ अगली पीढ़ी को सौंपती है और यही एक मजबूत और जीवंत लोकतंत्र की नींव है।
उपराज्यपाल ने विद्वानों, शिक्षकों, कलाकारों और नागरिकों से भारत की सभ्यतागत विरासत के संरक्षण में योगदान देने का भी आग्रह किया।
उन्होंने कहा कि ऐसे कई गांव हैं जिनकी कहानियां अभी तक लिखी नहीं गई हैं, ऐसी बोलियां हैं जिनका व्याकरण अभी तक अध्ययन नहीं किया गया है और ऐसे लोकगीत हैं जिन्हें अभी तक रिकॉर्ड नहीं किया गया है। इनमें से प्रत्येक प्रयास हमारे राष्ट्रीय संग्रह को समृद्ध करेगा।
हिन्दुस्थान समाचार / बलवान सिंह

