कश्मीर ने पूरे एशिया से विद्वानों को आकर्षित किया और अरब जगत के साथ ज्ञान साझा किया: मनोज सिन्हा

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श्रीनगर, 20 जून (हि.स.)। जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने कहा कि कश्मीर प्राचीन काल में एशिया के प्रमुख शिक्षा और ज्ञान केंद्रों में से एक था, जहां अफगानिस्तान, मध्य एशिया और अन्य क्षेत्रों से विद्वान अध्ययन और शोध के लिए आते थे। उन्होंने कहा कि कश्मीर में संरक्षित और अध्ययन किए गए अनेक संस्कृत ग्रंथों का अरबी भाषा में अनुवाद किया गया, जिसके माध्यम से भारत की बौद्धिक और दार्शनिक परंपराएं देश की सीमाओं से बहुत दूर तक पहुंचीं।

उपराज्यपाल शनिवार को श्रीनगर स्थित शेर-ए-कश्मीर इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस सेंटर (एसकेआईसीसी) में आयोजित ‘नालंदा डायलॉग-2026’ के उद्घाटन सत्र को संबोधित कर रहे थे। इस अवसर पर उन्होंने भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा, कश्मीर की ऐतिहासिक भूमिका और वैश्विक बौद्धिक आदान-प्रदान में उसके योगदान पर विस्तार से प्रकाश डाला।

मनोज सिन्हा ने कहा कि कश्मीर और नालंदा के बीच गहरा सभ्यतागत और बौद्धिक संबंध रहा है। दोनों ही विश्व के ऐसे प्रभावशाली ज्ञान केंद्र थे जिन्होंने विभिन्न महाद्वीपों में दार्शनिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक विमर्श को नई दिशा दी। ये संस्थान केवल शिक्षा के केंद्र नहीं थे, बल्कि विचारों, शोध, संवाद और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के वैश्विक मंच के रूप में कार्य करते थे।

उपराज्यपाल ने कहा कि इस प्रकार के आयोजन समाज में चिंतन, आत्ममंथन और बौद्धिक संवाद की संस्कृति को मजबूत करते हैं। ऐसे कार्यक्रम हमें अपने गौरवशाली अतीत को समझने, वर्तमान का मूल्यांकन करने और भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार होने का अवसर देते हैं। सार्थक संवाद और ज्ञान आधारित विमर्श किसी भी समाज के विकास की आधारशिला होते हैं।

प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय का उल्लेख करते हुए उपराज्यपाल ने कहा कि इसकी प्रसिद्ध नौ मंजिला पुस्तकालय आज भी भारत की समृद्ध ज्ञान परंपरा और वैश्विक सभ्यता में उसके योगदान का प्रतीक मानी जाती है। उन्होंने कहा कि नालंदा, तक्षशिला, विक्रमशिला और अन्य प्राचीन शिक्षण संस्थान केवल भारतीय उपमहाद्वीप के नहीं, बल्कि पूरे विश्व के ज्ञान केंद्र थे, जहां विभिन्न देशों और संस्कृतियों के विद्यार्थी और विद्वान अध्ययन के लिए आते थे।

मनोज सिन्हा ने कहा कि भारत की पहचान सदैव उसके महान ज्ञान केंद्रों और बौद्धिक परंपराओं से जुड़ी रही है। इन संस्थानों ने विभिन्न संस्कृतियों, भाषाओं और विचारधाराओं को जोड़ने का कार्य किया तथा भारतीय सभ्यता के खुलेपन, समावेशिता और ज्ञान के प्रति सम्मान को दुनिया के सामने प्रस्तुत किया।

कश्मीर की ऐतिहासिक भूमिका का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि यह क्षेत्र प्राचीन काल में शारदा पीठ जैसे प्रतिष्ठित शिक्षण केंद्र का घर था, जिसे तत्कालीन विश्व के सबसे सम्मानित ज्ञान संस्थानों में गिना जाता था। शारदा पीठ न केवल शिक्षा और दर्शन का केंद्र था, बल्कि यह विभिन्न सभ्यताओं के बीच वैचारिक संवाद का भी महत्वपूर्ण माध्यम बना।

उपराज्यपाल ने कहा कि कश्मीर कभी ज्ञान, साहित्य, दर्शन और संस्कृति का प्रमुख केंद्र था। यहां शिक्षा प्राप्त करने के लिए दूर-दूर से विद्वान आते थे। अफगानिस्तान, मध्य एशिया और अन्य क्षेत्रों के विद्यार्थी संस्कृत भाषा तथा ज्ञान की विभिन्न शाखाओं का अध्ययन कर अपने-अपने देशों में भारतीय विचारधारा और ज्ञान परंपरा का प्रसार करते थे।

उन्होंने कहा कि भारत से अन्य सभ्यताओं तक ज्ञान के प्रसार में कश्मीर ने सेतु की भूमिका निभाई। विभिन्न देशों के विद्वानों का यहां नियमित आवागमन होता था और यहां अध्ययन किए गए अनेक संस्कृत ग्रंथों का अरबी में अनुवाद किया गया। इस प्रक्रिया ने भारतीय दर्शन, विज्ञान, गणित और साहित्य से जुड़े विचारों को अरब जगत और अन्य क्षेत्रों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

मनोज सिन्हा ने कहा कि संस्कृत ग्रंथों के अरबी अनुवाद केवल भाषाई परिवर्तन नहीं थे, बल्कि वे विभिन्न सभ्यताओं के बीच बौद्धिक संवाद और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का माध्यम बने। कश्मीर ने भारतीय और पश्चिमी एशियाई बौद्धिक परंपराओं को जोड़ने वाले एक महत्वपूर्ण पुल के रूप में कार्य किया।

उन्होंने कहा कि आज आवश्यकता इस बात की है कि भारत अपनी प्राचीन ज्ञान परंपरा, शैक्षणिक विरासत और बौद्धिक संपदा को नई पीढ़ी तक पहुंचाए। साथ ही आधुनिक शिक्षा और अनुसंधान को भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों और ज्ञान परंपराओं से जोड़कर वैश्विक स्तर पर नई पहचान स्थापित करे।

उपराज्यपाल ने विश्वास व्यक्त किया कि ‘नालंदा डायलॉग’ जैसे मंच देश और दुनिया के विद्वानों को एक साथ लाकर ज्ञान, शोध, संस्कृति और सभ्यताओं के बीच संवाद को और अधिक मजबूत करेंगे तथा भारत की प्राचीन बौद्धिक विरासत को नई पीढ़ी के सामने प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करने में सहायक सिद्ध होंगे।-------------

हिन्दुस्थान समाचार / बलवान सिंह

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