विधानसभा में जमीन प्रस्ताव पर जसरोटिया का तीखा विरोध-बोले “कानूनी तौर पर अस्थिर, खोल देगा पैंडोरा बॉक्स”
कठुआ, 31 मार्च (हि.स.)। जम्मू-कश्मीर विधानसभा में भूमि से जुड़े प्रस्ताव पर बीजेपी विधायक राजीव जसरोटिया ने मंगलवार को कड़ा विरोध दर्ज कराते हुए इसे कानूनी और संवैधानिक रूप से अव्यवहारिक करार दिया। उन्होंने कहा कि यह मामला पहले से ही अदालत में विचाराधीन है, ऐसे में इसे सदन में लाना न्यायिक प्रक्रिया की मर्यादा के खिलाफ है।
बहस में हिस्सा लेते हुए जसरोटिया ने सवाल उठाया कि जब मामला न्यायालय में लंबित है, तो उस पर चर्चा या कानून बनाने की कोशिश क्यों की जा रही है। उन्होंने चेतावनी दी कि इस तरह के कदम न्यायिक प्रक्रिया को कमजोर कर सकते हैं। उन्होंने इस प्रस्ताव की तुलना चर्चित रोशनी एक्ट से करते हुए कहा कि यह “उसी तरह की एक और कोशिश” नजर आती है। जसरोटिया ने याद दिलाया कि रोशनी योजना से जहां करीब 25 हजार करोड़ रुपये के राजस्व का दावा किया गया था, वहीं हकीकत में यह योजना कानूनी और आर्थिक दोनों स्तरों पर विफल रही और अंततः अदालत ने इसे असंवैधानिक करार दे दिया।
बीजेपी विधायक ने यह भी कहा कि इस मामले में अब भी अदालत में समीक्षा याचिकाएं लंबित हैं, ऐसे में इससे जुड़े किसी नए प्रस्ताव को लाना पूरी तरह अनुचित है। जसरोटिया ने प्रस्ताव के व्यापक प्रभावों को लेकर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि सरकारी, राज्य, निजी और शामलाट भूमि पर अतिक्रमण को नियमित करने जैसी कोशिशें खतरनाक साबित हो सकती हैं। खासकर उन मामलों में, जहां निर्धारित कट-ऑफ तिथि के बाद अतिक्रमण हुआ है, ऐसे लोगों को कोई कानूनी अधिकार नहीं दिया जा सकता। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर ऐसे प्रस्ताव को स्वीकार किया गया तो यह “पैंडोरा बॉक्स” खोलने जैसा होगा, जिससे पूरे केंद्र शासित प्रदेश में अवैध कब्जों को बढ़ावा मिलेगा। इससे वन भूमि और अन्य संरक्षित क्षेत्रों पर भी अतिक्रमण को रोकना मुश्किल हो जाएगा।
जसरोटिया ने 1903 से जुड़े पुराने प्रावधानों और बाद के प्रशासनिक आदेशों का जिक्र करते हुए सवाल उठाया कि क्या मौजूदा प्रस्ताव बिना कानूनी स्पष्टता के उन्हीं व्यवस्थाओं को फिर से लागू करने की कोशिश है। उन्होंने प्रस्ताव लाने वाले सदस्य से यह भी स्पष्ट करने की मांग की कि क्या यह प्रस्ताव तय समयसीमा के बाद के मामलों को भी लाभ देने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा कि ऐसा कदम प्रशासनिक जटिलताओं को बढ़ाएगा और नए कानूनी विवाद खड़े करेगा। मामले को गंभीर बताते हुए जसरोटिया ने दोहराया कि यह प्रस्ताव न तो उचित है और न ही कानूनी रूप से सही। उन्होंने कहा कि सदन को अपनी सीमाओं में रहकर काम करना चाहिए और न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान करना चाहिए। अंत में उन्होंने प्रस्ताव का कड़ा विरोध करते हुए कहा कि कानून का पालन और सार्वजनिक जमीन की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।
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हिन्दुस्थान समाचार / सचिन खजूरिया

