दाचीगाम राष्ट्रीय उद्यान में अक्टूबर माह के दौरान प्रवेश निलंबित

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श्रीनगर, 12 अक्टूबर (हि.स.)। लुप्तप्राय कश्मीरी हिरण (हंगुल) को उसके पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील प्रजनन काल के दौरान किसी भी प्रकार की बाधा से बचाने के लिए दाचीगाम राष्ट्रीय उद्यान में अक्टूबर माह के दौरान प्रवेश निलंबित कर दिया गया है।

एक आदेश के अनुसार राष्ट्रीय उद्यान में प्रवेश की अनुमति 31 अक्टूबर तक निलंबित कर दी गई है। यह आदेश श्रीनगर के केंद्रीय प्रभाग के वन्यजीव वार्डन की सिफारिश के बाद जारी किया गया जिसे कश्मीर क्षेत्र के क्षेत्रीय वन्यजीव वार्डन ने अनुमोदित किया।

एक महीने तक चलने वाला यह प्रतिबंध सभी आगंतुकों, पर्यटकों और अन्य व्यक्तियों पर लागू होता है, सिवाय उन लोगों के जो विभागीय आवश्यक कार्यों, वन्यजीव संरक्षण और प्रबंधन कार्यों, आपात स्थितियों या सक्षम प्राधिकारी द्वारा विशेष रूप से अधिकृत गतिविधियों में लगे हुए हैं। इस अवधि के दौरान अनुमत प्रवेश को सख्ती से विनियमित किया जाएगा और न्यूनतम आवश्यक तक सीमित रखा जाएगा।

श्रीनगर के केंद्रीय प्रभाग के वन्यजीव वार्डन को प्रवेश द्वारों, चौकियों और फील्ड स्टाफ को निर्देश देकर, अनधिकृत प्रवेश को रोककर और प्रतिबंध के बारे में व्यापक रूप से जानकारी देकर आदेश के सख्त कार्यान्वयन को सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया है।

अधिकारियों ने बताया कि दाचीगाम राष्ट्रीय उद्यान में अक्टूबर में लगाया गया प्रतिबंध हंगुल पक्षी के प्रजनन चक्र के महत्वपूर्ण समय यानी प्रजनन काल के दौरान मानवीय हस्तक्षेप को कम करने और प्रजाति के संरक्षण के लिए चल रहे प्रयासों का समर्थन करने के उद्देश्य से है।

दाचीगाम राष्ट्रीय उद्यान इस प्रजाति का मुख्य गढ़ बना हुआ है लेकिन माना जाता है कि इसकी आबादी अनंतनाग के शिकारगाह, ट्राल वन्यजीव अभयारण्य और ओवरा वन्यजीव अभयारण्य में मौजूद छोटे समूहों से काफी हद तक अलग हो गई है। यह अस्थायी प्रतिबंध हंगुल (जिसे कश्मीर स्टैग के नाम से भी जाना जाता है) के संरक्षण के लिए जारी प्रयासों के बीच लगाया गया है। हंगुल इस क्षेत्र की प्रतिष्ठित और गंभीर रूप से लुप्तप्राय हिरण प्रजाति है। पिछले एक दशक में हंगुल की आबादी में उत्साहजनक वृद्धि देखी गई है जो 2015 में 183 से बढ़कर 2025 में 323 हो गई है। हालांकि यह प्रजाति संरक्षण के लिए काफी दबाव में है और वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की अनुसूची I में सूचीबद्ध है जबकि प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ ने इसे गंभीर रूप से लुप्तप्राय के रूप में वर्गीकृत किया है। पिछले चार-पांच दशकों में हंगुल की आबादी में भारी गिरावट आई है। अवैध शिकार, पालतू पशुओं के साथ प्रतिस्पर्धा, पर्यावास का क्षरण और विखंडन को इस गिरावट के प्रमुख कारणों के रूप में पहचाना गया है।

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हिन्दुस्थान समाचार / सुमन लता

Livevns.news Desk
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