कांग्रेस नेता संजय सप्रू ने कश्मीरी पंडितों के लिए सरकार की पुनर्वास नीति की तीखी और विस्तृत आलोचना की
श्रीनगर, 10 अप्रैल (हि.स.)। कांग्रेस नेता संजय सप्रू ने शुक्रवार को कश्मीरी पंडितों के लिए सरकार की पुनर्वास नीति की तीखी और विस्तृत आलोचना की। उनके द्वारा दायर एक आरटीआई से आधिकारिक दावों और जमीनी हकीकतों के बीच स्पष्ट अंतर उजागर हुआ है। इन निष्कर्षों को बेहद चिंताजनक बताते हुए सप्रू ने कहा कि 2009 के बहुचर्चित प्रधानमंत्री पैकेज जिसके लिए 1618.40 करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे वास्तविक बदलाव का साधन बनने के बजाय केवल एक आशय का दस्तावेज बनकर रह गया है।
उन्होंने कहा कि एक दशक से अधिक समय से लगातार सरकारों ने इस पैकेज को पुनर्वास की आधारशिला बताया है लेकिन आरटीआई से पता चलता है कि इस योजना के तहत वास्तव में केवल तीन परिवार ही लौटे हैं। यह न केवल अपर्याप्त प्रदर्शन है बल्कि कार्यान्वयन की व्यवस्था का पूरी तरह से विफल होना है। उन्होंने बताया कि रोजगार और पारगमन आवास जैसे कुछ घटक कागजों पर आंशिक प्रगति दिखाते हैं लेकिन वे सार्थक पुनर्वास में तब्दील नहीं हो पाते हैं। उन्होंने कहा कि पद भरना या ट्रांजिट यूनिट बनाना सम्मानजनक वापसी के बराबर नहीं है। पुनर्वास कोई आंकड़ा नहीं है। यह एक जीती-जागती हकीकत है और वह हकीकत स्पष्ट रूप से गायब है।
कांग्रेस नेता ने सामुदायिक भागीदारी के लिए किसी भी संरचित या संस्थागत तंत्र के अभाव पर भी चिंता व्यक्त की और इसे “गंभीर नीतिगत शून्यता” बताया। उन्होंने आगे कहा कि मंदिरों और तीर्थस्थलों सहित प्रवासी धार्मिक संपत्तियों की सुरक्षा और प्रबंधन जैसे प्रमुख मुद्दे बिना किसी समर्पित ढांचे या जवाबदेही के नौकरशाही निगरानी तक ही सीमित हैं।
सप्रू ने कहा कि आरटीआई ने नीतिगत घोषणाओं और जमीनी परिणामों के बीच बढ़ती और असहज खाई को प्रभावी ढंग से उजागर किया है। उन्होंने कहा कि हम जो देख रहे हैं वह दिखावे से प्रेरित शासन है, न कि परिणामों से। घोषणाएं की जाती हैं, धन आवंटित किया जाता है लेकिन क्रियान्वयन गायब रहता है। उन्होंने कहा। तत्काल सुधारात्मक उपायों की मांग करते हुए उन्होंने सरकार से योजना का पारदर्शी ऑडिट करने, देरी के लिए जवाबदेही तय करने और विश्वास निर्माण, सुरक्षा और स्थायी पुनर्वास को प्राथमिकता देने वाला एक विश्वसनीय, समयबद्ध रोडमैप तैयार करने का आग्रह किया।
सप्रू ने जोर देकर कहा कि कश्मीरी पंडितों की वापसी को केवल प्रतीकात्मक कहानी तक सीमित नहीं किया जा सकता। इसके लिए ईमानदारी, राजनीतिक इच्छाशक्ति और ठोस कार्रवाई की आवश्यकता है। इससे कम कुछ भी उस समुदाय के साथ अन्याय होगा जो दशकों से विस्थापन झेल रहा है।
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हिन्दुस्थान समाचार / सुमन लता

