विपक्ष को व्यवधान से जोड़ना आलोचक और उसके पक्ष दोनों की विश्वसनीयता को कमजोर करता है: जीएल रैना

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जम्मू, 24 फ़रवरी (हि.स.)। उमर अब्दुल्ला द्वारा राहुल गांधी को प्रभावी विपक्षी नेता के रूप में चित्रित करने का हालिया प्रयास न केवल विरोधाभासी है बल्कि राजनीतिक रूप से अवसरवादी और बौद्धिक रूप से निराधार भी है। यह उनके राजनीतिक रुख में स्पष्ट असंगति को उजागर करता है। यह बयान आज भारतीय जनता पार्टी (जम्मू-कश्मीर-केंद्र शासित प्रदेश) के पूर्व एमएलसी और प्रवक्ता जीएल रैना ने दिया। अब्दुल्ला की पिछली टिप्पणियों को याद करते हुए रैना ने कहा कि कुछ समय पहले ही उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पर जम्मू-कश्मीर चुनावों के दौरान पर्याप्त काम न करने का आरोप लगाया था। फिर भी आज वे राहुल गांधी की विपक्षी नेता के रूप में अपनी जिम्मेदारियों को प्रभावी ढंग से निभाने के लिए प्रशंसा कर रहे हैं।

इस तरह के विरोधाभास एक सीधा सा सवाल खड़ा करते हैं: जनता को उमर अब्दुल्ला के किस रूप पर विश्वास करना चाहिए? रैना ने कहा कि यह विशेष रूप से हैरान करने वाला है कि श्री अब्दुल्ला अब इंडिया ब्लॉक के उन लोगों पर सवाल उठा रहे हैं जो नेतृत्व पर पुनर्विचार चाहते हैं जबकि उन्होंने खुद गठबंधन के कामकाज की बार-बार आलोचना की है - एक बार तो इसे जीवन रक्षक यंत्र पर बताया था। कांग्रेस द्वारा उठाए गए मुद्दों पर उनकी पहले की आपत्तियां, जिनमें चुनावी प्रक्रियाओं से जुड़े आरोप जैसे वोट चोरी और ईवीएम के कामकाज से संबंधित आरोप शामिल हैं उनके वर्तमान समर्थन को दृढ़ विश्वास से अधिक राजनीतिक सुविधा की तरह प्रतीत कराती हैं। रैना ने आगे कहा कि यह सिद्धांतों के बजाय सुविधा के आधार पर रुख बदलने के एक पैटर्न को उजागर करता है। रैना ने पूछा, यदि यह प्रशंसा वास्तविक है तो अब्दुल्ला को स्पष्ट रूप से उत्तर देना होगा: राहुल गांधी के किन विशिष्ट कार्यों का समर्थन किया जाना चाहिए? क्या यह संसद में लगातार व्यवधान है जो विधायी कार्य को रोक देता है? क्या यह टकराव वाली राजनीति है जो असहमति और अव्यवस्था के बीच की रेखा को धुंधला कर देती है? या वह बयानबाजी जो अक्सर ठोस बहस के बजाय व्यक्तिगत हमलों में बदल जाती है।

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हिन्दुस्थान समाचार / रमेश गुप्ता

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