आज़ादी दिवस से पहले तीन बहनों ने भारत के साइलेंट विलेज की छतों पर लगाया तिरंगा

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भद्रवाह, 14 अगस्त (हि.स.)। जम्मू-कश्मीर के भद्रवाह की धाडकाई गांव की तीन मूक-बधिर बहनों रेशमा बीबी (26), परवीन कौसर (24) और सायरा खातून (22) ने अब तक 150 से ज़्यादा तिरंगे बांटे हैं।

वे देशव्यापी 'हर घर तिरंगा' अभियान में शामिल हुई हैं और यह सुनिश्चित करने में मदद कर रही हैं कि गांव के हर घर तक राष्ट्रीय ध्वज पहुंचे। तिरंगा अभियान अब तक जम्मू कश्मीर के डोडा ज़िले में पहाड़ी पर बसे दूर-दराज़ के गांव धाडकाई तक नहीं पहुंचा था। धाडकाई समुद्र तल से 9,150 फीट की ऊंचाई पर स्थित है और यहां सड़क संपर्क की कमी है। यहां लगभग 2,000 लोग रहते हैं जो सभी आदिवासी गुर्जर समुदाय से हैं। यहां के 90 से ज़्यादा निवासियों को जन्म से ही सुनने और बोलने में अक्षमता है इसलिए इसे साइलेंट विलेज (मूक गांव) कहा जाता है।

बहनों के पिता रेहम अली को बहुत गर्व है। उन्होंने कहा कि उनकी बेटियों ने झंडे सिलने का अपना पक्का इरादा जताया और ज़िद की कि वे उनके लिए ज़रूरी कपड़ा लाएं।

उन्होंने कहा कि मैं अपनी भेड़ों के साथ चरागाह में था और जब मैं घर लौटा तो उन्होंने इशारों से साफ़ कर दिया कि उन्हें तिरंगा बनाने के लिए कपड़ा चाहिए। वे इतनी पक्के इरादे वाली हैं कि उन्होंने खाना खाने से भी इनकार कर दिया जब तक कि मैं उनकी मांग पूरी करने के लिए सहमत नहीं हो गया। मैं बाज़ार गया कपड़ा खरीदा और उन्हें दे दिया।

खुशी से भरे पिता ने कहा कि पिछले पांच दिनों में उन्होंने 150 से ज़्यादा तिरंगे सिले और बांटे हैं। मुझे अपनी बेटियों और उन्होंने जो हासिल किया है उस पर बहुत गर्व है।

स्थानीय लोगों ने कहा कि हालांकि उन्हें 2022 में इसके पहले संस्करण के बाद से 'हर घर तिरंगा' अभियान के बारे में पता था लेकिन यह अब तक दधकाई-बी तक नहीं पहुंच पाया है जहां सुदूर गांव एक खड़ी पहाड़ी पर बसा है।

बहनों के घर के बगल में रहने वाले जमात दानिश ने कहा कि गांव की छतों से तिरंगे को लहराते देखने का चार साल का इंतजार आखिरकार खत्म हो गया। दशकों से ग्रामीणों ने अपनी खुद की एक अनूठी सांकेतिक भाषा विकसित की है जिसे वहां के निवासी आसानी से समझ लेते हैं और इसमें संवाद करते हैं। दानिश ने कहा कि उन्होंने उस गांव में जान डाल दी है जो अन्यथा एक सोया हुआ गांव था। उन्होंने कहा कि अब लगभग हर छत को तिरंगे से सजाया गया है जबकि बच्चों को गर्व के साथ राष्ट्रीय ध्वज लहराते देखा जा सकता है।

गांव के बुजुर्ग और दधकाई-बी के पूर्व सरपंच हाजी अब्दुल लतीफ (75) उन लोगों में शामिल थे जिन्हें तीनों बहनों से तिरंगे के बंडल मिले। उन्होंने कहा कि उनकी पहल से दूरदराज के गांव में गर्व और भागीदारी की भावना आई है।

लतीफ ने कहा कि यह देखकर खुशी होती है कि अपनी विकलांगता के बावजूद हमारी बेटियों ने ऐसा दृढ़ संकल्प दिखाया है और पूरे गांव को गौरवान्वित किया है। उनका प्रयास निश्चित रूप से दूसरों को प्रेरित करेगा।

हिन्दुस्थान समाचार / राधा पंडिता

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