रीढ़-रहित समाज पर करारा व्यंग्य, नटरंग के नाटक ‘रीढ़-रहित’ ने दिया अधिकारों के लिए आवाज उठाने का संदेश
जम्मू, 26 जुलाई (हि.स.)। नटरंग की रविवार थिएटर श्रृंखला के अंतर्गत स्टूडियो थिएटर में रविवार को प्रसिद्ध रूसी साहित्यकार एंटोन चेखव की कहानी ‘निनकॉम्पूप’ पर आधारित हिंदी रूपांतरण ‘रीढ़-रहित’ का प्रभावशाली मंचन किया गया। सत्येंद्र शरत द्वारा रूपांतरित इस नाटक का निर्देशन नीरज कांत ने किया। सामाजिक संदेश से भरपूर इस प्रस्तुति ने दर्शकों को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक रहने और अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने की प्रेरणा दी।
नाटक की कहानी एक जमींदार और उसके बच्चों को पढ़ाने वाली शिक्षिका जूलिया के इर्द-गिर्द घूमती है जो घर के अन्य काम भी करती है। दो महीने से वेतन न मिलने के बाद जब जूलिया भुगतान लेने आती है तो जमींदार जानबूझकर विभिन्न मनगढ़ंत कटौतियों का हवाला देकर तय 8,000 रूपये की जगह केवल 1,100 रूपये देने की बात करता है। स्वभाव से अत्यंत संकोची जूलिया बिना किसी विरोध के वह राशि स्वीकार कर लेती है। उसकी यही चुप्पी देखकर जमींदार उसे आत्मसम्मान और श्रम की गरिमा का महत्व समझाता है तथा कहता है कि यदि व्यक्ति अपने अधिकारों के लिए स्वयं आवाज नहीं उठाएगा तो उसका शोषण होता रहेगा। अंत में वह जूलिया को पूरा 8,000 रूपये का वेतन देकर अपने इस मानवीय प्रयोग का समापन करता है।
नाटक ने यह संदेश प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया कि अन्याय और शोषण के खिलाफ मौन रहने के बजाय साहसपूर्वक अपने अधिकारों के लिए खड़ा होना आवश्यक है। संवेदनशील कथानक, सशक्त निर्देशन और कलाकारों के जीवंत अभिनय ने दर्शकों को अंत तक बांधे रखा। प्रस्तुति में कुशल भट्ट, वृंदा गुज्राल और विशाल शर्मा ने प्रभावशाली अभिनय किया। नाटक की प्रकाश व्यवस्था नीरज कांत तथा संगीत संचालन कुशल भट्ट ने संभाला। कार्यक्रम का संचालन प्रियाल अशोक गुप्ता ने किया। दर्शकों ने नाटक की विषयवस्तु और प्रस्तुति की सराहना करते हुए कलाकारों का उत्साहवर्धन किया।
हिन्दुस्थान समाचार / राहुल शर्मा

