भदरवाह से लैवेंडर के 6 लाख पौधे मंगवाए गए, उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर के 650 नए किसानों में किए गए वितरित

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भदरवाह, 21 फ़रवरी (हि.स.) जम्मू-कश्मीर और उत्तराखंड में लैवेंडर की खेती को बढ़ावा देने के लिए एक महत्वपूर्ण पहल के तहत भदरवाह की 50 नर्सरियों से लैवेंडर के 6 लाख उच्च गुणवत्ता वाले पौध (क्यूपीएम) खरीदे गए।

भदरवाह भारत में प्रसिद्ध सुगंधित फसल 'पर्पल रिवोल्यूशन' लाने के लिए जाना जाता है। इन पौधों को लगभग 650 किसानों तक पहुंचाया गया। पारंपरिक फसलों से हटकर अधिक लाभदायक सुगंधित फूलों की खेती करने के इच्छुक नए किसानों को लैवेंडर के पौध का मुफ्त वितरण 'पर्पल रिवोल्यूशन' को और आगे बढ़ाने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।

सीएसआईआर-आईआईआईएम जम्मू के लैवेंडर वैज्ञानिक डॉ. संदीप सिंह चरक ने बताया कि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री डॉ. जतिंदर सिंह के निर्देश पर 'पर्पल रिवोल्यूशन' को बढ़ावा देने के लिए पौध की खरीद और वितरण का कार्य सीएसआईआर-अरोमा मिशन के तीसरे चरण के अंतर्गत किया गया है। डॉ. संदीप सिंह चरक ने कहा, इस वर्ष अकेले आईआईएम जम्मू ने भदरवाह की 50 नर्सरियों में स्थानीय किसानों द्वारा उगाए गए 6 लाख लैवेंडर के पौधे प्राप्त किए हैं जिन्हें उत्तराखंड के 400 किसानों और जम्मू और कश्मीर के राजौरी, पुंछ और डोडा जिलों के 250 नए किसानों में वितरित किया गया है।

प्रगतिशील किसान और युवा उद्यमी तौकीर बागबान, जिन्हें 'भारत का लैवेंडर मैन' भी कहा जाता है, ने सफलतापूर्वक 2500 किसानों को पारंपरिक मक्का की खेती छोड़कर सुगंधित लैवेंडर की खेती करने के लिए प्रेरित किया है और इस तरह बैंगनी क्रांति लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने कहा, यह लैवेंडर किसानों के लिए एक बड़ा प्रोत्साहन है क्योंकि सीएसआईआर-आईआईएम ने न केवल नर्सरी मालिकों से छह लाख पौधे खरीदे बल्कि उन नए किसानों को मुफ्त पौधे भी वितरित किए जो पारंपरिक फसल से लैवेंडर की खेती की ओर रुख करना चाहते हैं। इस सारी सफलता का श्रेय हमारे मंत्री डॉ. जतिंदर सिंह को जाता है।

लैवेंडर की खेती अपनाने से किसानों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है जिससे उनकी आमदनी लगभग 40,000-60,000 प्रति हेक्टेयर से बढ़कर 3,50,000-6,00,000 प्रति हेक्टेयर से अधिक हो गई है। लैवेंडर कम रखरखाव वाली, सूखा-प्रतिरोधी और पशु-प्रतिरोधी फसल है जो इसे पहाड़ी क्षेत्रों के लिए उपयुक्त बनाती है।

रोपण के पहले दो वर्षों के बाद यह लगभग 15 वर्षों तक प्रतिफल देती है। कार्यक्रम का व्यापक विस्तार हुआ है जिसके तहत किसानों को 30 लाख से अधिक मुफ्त पौधे दिए गए हैं और अब यह जम्मू-कश्मीर से आगे बढ़कर उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और उत्तर-पूर्वी राज्यों सहित भारत के अन्य हिस्सों तक भी फैल गया है।

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हिन्दुस्थान समाचार / सुमन लता

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