प्राचीन लिपियों और पांडुलिपियों के संरक्षण पर दो दिवसीय कार्यशाला संपन्न
शिमला, 22 अप्रैल (हि.स.)। भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान शिमला में पश्चिमी हिमालय के अंतर्गत प्राचीन लेखनकला की धरोहर—हिमाचल की लिपियाँ एवं पाण्डुलिपियों का संरक्षण विषय पर आयोजित दो दिवसीय कार्यशाला का बुधवार को समापन हो गया। इस कार्यशाला में हिमाचल प्रदेश और पश्चिमी हिमालय क्षेत्र की पुरानी लिपियों और पांडुलिपियों को बचाने और समझने पर विस्तार से चर्चा की गई।
इस कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य शारदा से विकसित पाबुची, टाकरी, पण्डवाणी और चंदवाणी जैसी प्राचीन लिपियों और उनसे जुड़ी पांडुलिपि परंपरा के संरक्षण को बढ़ावा देना था। कार्यक्रम के दौरान अलग-अलग सत्रों में विशेषज्ञों और विद्वानों ने पांडुलिपियों को सुरक्षित रखने के तरीके, उनका इतिहास, उन्हें पढ़ने-समझने की विधियां और क्षेत्रीय परंपराओं पर अपने विचार साझा किए। साथ ही, इन विषयों पर चर्चा और विचार-विमर्श भी किया गया।
कार्यशाला के उद्घाटन सत्र में पांडुलिपियों की एक प्रदर्शनी भी लगाई गई, जिसमें प्रतिभागियों को प्राचीन लेखन परंपरा की झलक देखने को मिली। इस दौरान वक्ताओं ने पांडुलिपियों के महत्व और उनके संरक्षण की जरूरत पर जोर दिया।
समापन सत्र की अध्यक्षता संस्थान की टेगोर अध्येता प्रो. उमा सी. वैद्य ने की और मुख्य अतिथि के रूप में प्रो. कवर सिंह शर्मा मौजूद रहे। कार्यशाला के संयोजक प्रो. ओमप्रकाश शर्मा ने दो दिनों में हुई चर्चाओं और प्रस्तुत शोध-पत्रों का सार पेश किया। उन्होंने कहा कि पांडुलिपियों का संरक्षण, सूचीकरण, डिजिटलीकरण और प्रलेखन भविष्य के शोध के लिए बेहद जरूरी है।
मुख्य अतिथि प्रो. कवर सिंह शर्मा ने अपने संबोधन में कहा कि प्राचीन लिपियां और पांडुलिपियां भारतीय ज्ञान परंपरा की नींव हैं और इन्हें बचाने के लिए संस्थागत और व्यक्तिगत स्तर पर प्रयास बढ़ाने की जरूरत है। वहीं, प्रो. उमा सी. वैद्य ने पांडुलिपियों के संरक्षण के तकनीकी और व्यावहारिक पहलुओं पर जोर देते हुए इस क्षेत्र में लगातार शोध और प्रशिक्षण की आवश्यकता बताई।
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हिन्दुस्थान समाचार / उज्जवल शर्मा

