अशोक सिंहल ने हिंदू समाज में सांस्कृतिक पहचान पर गर्व का भाव जगाया : बजरंग लाल बागड़ा

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अशोक सिंहल ने हिंदू समाज में सांस्कृतिक पहचान पर गर्व का भाव जगाया : बजरंग लाल बागड़ा


शिमला, 14 अक्टूबर (हि.स.)। विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष रहे श्रद्धेय अशोक सिंहल ने हिंदू समाज में अपनी सांस्कृतिक पहचान को लेकर गर्व का भाव जगाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। राजनीतिक स्वतंत्रता का महत्व तब अधूरा रह जाता है, जब कोई समाज अपनी संस्कृति और परंपराओं से पीछे रह जाए। ये बात विश्व हिंदू परिषद के केंद्रीय महामंत्री बजरंग लाल बागड़ा ने बुधवार को शिमला के ऐतिहासिक गेयटी थिएटर में श्रद्धेय अशोक सिंहल के जन्मशताब्दी वर्ष के उद्घाटन समारोह को संबोधित करते हुए कही।

बागड़ा ने कहा कि स्वामी विवेकानंद के बाद अशोक सिंहल ने ऐसे संगठनात्मक प्रयास किए, जिनसे हिंदू समाज में अपनी पहचान को लेकर आत्मविश्वास बढ़ा। उन्होंने कहा कि वर्ष 1940 से 1980 के बीच के दौर में हिंदू शब्द के इस्तेमाल को सांप्रदायिक नजरिए से देखा जाता था। उस कालखंड में अशोक सिंहल ने इस स्थिति को बदलने के लिए काम किया तथा उनके प्रयासों से हिंदुओं में अपनी पहचान को लेकर लज्जा के स्थान पर गर्व का भाव बढ़ा।

बागड़ा ने अशोक सिंहल के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विश्व हिंदू परिषद में किए गए कार्यों का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि जब सिंहल दिल्ली में संघ के प्रांत प्रचारक थे, उस समय संगठन का काम तेजी से आगे बढ़ा। दिल्ली में बड़े पैमाने पर धर्मांतरण की एक घटना के बाद उन्हें विश्व हिंदू परिषद में भेजा गया। बागड़ा के अनुसार सिंहल ने धर्मांतरण के कारणों का अध्ययन किया और इस दिशा में कई कार्यक्रम आयोजित किए। उन्होंने सामाजिक समरसता को आगे बढ़ाने के लिए भी काम किया।

बागड़ा ने वाल्मीकि समाज के संबंध में अशोक सिंहल के प्रयासों का जिक्र करते हुए कहा कि उन्होंने इस समाज पर शोध करवाया और वाल्मीकि बस्तियों में जाकर लोगों से संपर्क किया। बागड़ा ने अपने संबोधन में कहा कि इतिहास में हिंदुओं की रक्षा के दौरान बाल्मीकि समुदायों के लोगों के सामने मुगलों व अन्यों के साथ युद्ध में हार के बाद धर्म बदलने, मृत्यु स्वीकार करने या सफाई का काम अपनाने जैसे विकल्प रखे गए थे। उनके अनुसार कुछ लोगों ने कठिन परिस्थितियों के बावजूद अपना धर्म नहीं छोड़ा। उन्होंने ऐसे लोगों के योगदान को सम्मान के साथ याद करने की बात कही।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के हिमाचल प्रांत संघचालक प्रोफेसर वीर सिंह रांगड़ा ने अशोक सिंहल को भारत की ऋषि परंपरा का प्रतिनिधि और प्रखर राष्ट्रभक्त बताया। उन्होंने कहा कि सिंहल 24 वर्ष की उम्र में संघ के प्रचारक बन गए थे। 36 वर्ष की उम्र में उन्हें एक ही दिन में तीन बार हृदयाघात हुआ था। इसके बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी और मजबूत इच्छाशक्ति के साथ राष्ट्रनिर्माण में कार्य किया।

रांगड़ा ने बताया कि अशोक सिंहल अपने जीवन के उद्देश्य को लेकर गंभीरता से विचार करते थे। एक संघ कार्यकर्ता के कहने पर वे कानपुर में एक कथा सुनने गए थे। महाभारत की कथा सुनने के दौरान सिंहल ने कहा कि ईश्वर के प्रति भाव को राष्ट्रभाव से जोड़ना चाहिए। रांगड़ा के अनुसार बाद में सिंहल ने उस कथाकार को अपना धर्मगुरु बना लिया। उन्होंने अशोक सिंहल के जीवन की कई घटनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि वे संघ और विश्व हिंदू परिषद में सक्रिय रहे तथा सामाजिक समरसता के प्रखर समर्थक थे। उन्होंने सिंहल को अद्भुत गुणों और प्रतिभा का धनी बताया।

विश्व हिंदू परिषद हिमाचल प्रांत की ओर से आयोजित इस समारोह में हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल कविंद्र गुप्ता मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। विश्व हिंदू परिषद के केंद्रीय महामंत्री बजरंग लाल बागड़ा ने मुख्य वक्ता और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के हिमाचल प्रांत संघचालक प्रोफेसर वीर सिंह रांगड़ा ने कार्यक्रम अध्यक्ष के रूप में हिस्सा लिया। यह आयोजन अशोक सिंहल के जन्मशताब्दी वर्ष के उद्घाटन के अवसर पर किया गया।

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हिन्दुस्थान समाचार / उज्जवल शर्मा

Livevns.news Desk
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