राष्ट्रीय नाट्य महोत्सव की चौथी संध्या में गांधारी ने उठाए अंतर्मन और सत्य के सवाल

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राष्ट्रीय नाट्य महोत्सव की चौथी संध्या में गांधारी ने उठाए अंतर्मन और सत्य के सवाल


राष्ट्रीय नाट्य महोत्सव की चौथी संध्या में गांधारी ने उठाए अंतर्मन और सत्य के सवाल


मंडी, 06 अक्टूबर (हि.स.)। संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार के सहयोग से हिमाचल सांस्कृतिक शोध संस्थान एवं रंगमंडल, मंडी द्वारा आयोजित राष्ट्रीय नाट्य महोत्सव 2026 की चौथी संध्या में चेतना रंग समूह द्वारा महाभारत के विराट आख्यान पर आधारित नाटक गांधारी का प्रभावशाली मंचन किया गया। नाटक के लेखक जयवर्धन तथा परिकल्पना एवं निर्देशन आशीष श्रीवास्तव का था। सतोहल स्थित शकुंतलम नाट्य रंगशाला में प्रस्तुत इस नाटक ने दर्शकों को महाभारत के एक परिचित प्रसंग को गांधारी के अंतर्मन और उसकी आत्मयात्रा के माध्यम से देखने का अवसर दिया। गांधारी केवल महाभारत की एक पात्र की कथा नहीं, बल्कि उस स्त्री की अंतर्यात्रा है जिसने अपने पति धृतराष्ट्र के अंधत्व को स्वीकार करते हुए अपनी आँखों पर पट्टी बाँध ली। यह पट्टी धीरे-धीरे उसके जीवन में त्याग, समर्पण, पीड़ा, आक्रोश और अंततः आत्मबोध का प्रतीक बन जाती है।

गांधार नरेश की पुत्री गांधारी का विवाह जन्मांध धृतराष्ट्र से होता है। विवाह के समय जब उसे अपने पति के अंधत्व का पता चलता है, तो वह स्वयं भी आंखों पर पट्टी बांध लेती है। उसका यह निर्णय समाज में त्याग और पतिव्रता के आदर्श के रूप में देखा जाता है, लेकिन नाटक उसके भीतर छिपी उस पीड़ा को सामने लाता है, जहाँ गांधारी स्वयं को छल का शिकार महसूस करती है। यही पीड़ा धीरे-धीरे उसके भीतर प्रतिशोध और आक्रोश का रूप लेने लगती है। समय बीतता है और गांधारी कौरवों की मां बनती है।

पांडवों और कौरवों के बीच बढ़ता संघर्ष, द्रौपदी का चीरहरण और कुरुक्षेत्र की ओर बढ़ता विनाश इन सबके बीच गांधारी युद्ध को रोकना चाहती है, लेकिन पुत्रमोह, सत्ता, अहंकार और परिस्थितियों के सामने उसकी चेतावनियाँ प्रभावहीन हो जाती हैं।

कुरुक्षेत्र का युद्ध समाप्त होने के बाद जब उसके सौ पुत्रों का सर्वनाश हो जाता है, तो एक मां के रूप में गांधारी का दुःख और आक्रोश चरम पर पहुंच जाता है। दुर्योधन की मृत्यु से आहत गांधारी श्रीकृष्ण को इस विनाश का जिम्मेदार मानती है और उन्हें श्राप देती है। श्रीकृष्ण उस श्राप को सहज भाव से स्वीकार कर लेते हैं। यहीं से नाटक गांधारी के बाहरी संघर्ष से उसके भीतरी संघर्ष की ओर मुड़ता है। कृष्ण का मौन स्वीकार गांधारी को अपने जीवन के उस सत्य से सामना करवाता है, जिससे वह वर्षों से आंखों पर पट्टी बांधकर बचती रही थी। उसे एहसास होता है कि कुरुक्षेत्र के विनाश के लिए केवल परिस्थितियां या दूसरे लोग ही जिम्मेदार नहीं थे। उसके भीतर पलती प्रतिशोध की भावना, पुत्रमोह और अपनी आंखों पर बांधी गई पट्टी ने भी उसे सत्य को देखने और पहचानने से दूर रखा। प्रस्तुति इसी प्रश्न के साथ दर्शकों को छोड़ती है कि क्या केवल आंखों से देखना ही पर्याप्त है, या सत्य को पहचानने के लिए भीतर की आंखों का खुलना भी आवश्यक है।

नाटक ने गांधारी के चरित्र को केवल पौराणिक संदर्भ में नहीं, बल्कि आज के सामाजिक और मानवीय संदर्भ में भी प्रस्तुत किया। अन्याय को देखते हुए मौन रह जाना, अपने संबंधों और पूर्वाग्रहों के कारण सत्य से मुंह मोड़ लेना तथा समय रहते सही निर्णय न ले पाना—ये प्रश्न आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं।

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हिन्दुस्थान समाचार / मुरारी शर्मा

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