गर्भ में पल रहे बच्चे के मुंह में मिला दूसरा भ्रूण, डॉक्टर भी हैरान, सोनोग्राफी में दिखा दुर्लभ मामला

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गर्भ में पल रहे बच्चे के मुंह में मिला दूसरा भ्रूण, डॉक्टर भी हैरान, सोनोग्राफी में दिखा दुर्लभ मामला


शिमला, 10 अगस्त (हि.स.)। शिमला के इंदिरा गांधी मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल (आईजीएमसी) में डॉक्टरों के सामने ऐसा दुर्लभ मामला आया, जिसने चिकित्सा विशेषज्ञों को भी हैरान कर दिया। 20 वर्षीय गर्भवती महिला के गर्भ में पल रहे भ्रूण के मुंह के अंदर एक और भ्रूण विकसित हो रहा था। डॉक्टरों ने नियमित जांच के दौरान इस असामान्य स्थिति का पता लगाया। चिकित्सा विज्ञान में इसे ‘फीटस इन फीटू’ कहा जाता है। इस मामले की केस रिपोर्ट हाल ही में अंतरराष्ट्रीय मेडिकल जर्नल अल्ट्रासाउंड में प्रकाशित हुई है।

महिला की गर्भावस्था के 22वें सप्ताह से पहले सोनोग्राफी की गई थी। जांच के दौरान डॉक्टरों को गर्भ में पल रहे भ्रूण के निचले जबड़े के पास एक असामान्य मांसल संरचना दिखाई दी, जो बाहर की ओर निकली हुई थी। इस असामान्य संरचना को लेकर डॉक्टरों ने आगे जांच की। अल्ट्रासाउंड और अन्य इमेजिंग तकनीकों की मदद से विस्तृत जांच के बाद पता चला कि भ्रूण के मुंह के अंदर एक अविकसित दूसरे भ्रूण जैसी संरचना मौजूद थी।

डॉक्टरों के अनुसार ‘फीटस इन फीटू’ बेहद दुर्लभ स्थिति है। यह जुड़वां गर्भावस्था के दौरान भ्रूण के विकास से जुड़ी असामान्यता है। इसमें एक भ्रूण का विकास सामान्य रूप से नहीं हो पाता और वह दूसरे भ्रूण के शरीर के अंदर रह जाता है। ऐसे मामलों में यह संरचना आम तौर पर पेट या शरीर के किसी अन्य हिस्से में मिलती है। मुंह के अंदर इस तरह की संरचना मिलना अत्यंत दुर्लभ माना जाता है।

इस मामले की सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि इसकी पहचान बच्चे के जन्म के बाद नहीं, गर्भ में ही हो गई। डॉक्टरों ने इमेजिंग जांच के जरिए असामान्य संरचना की स्थिति और उससे जुड़े संभावित खतरे को समय रहते समझ लिया।

आईजीएमसी के रैडियोडायग्नोसिस विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. श्रुति ठाकुर के अनुसार यदि यह असामान्य संरचना गर्भ में बढ़ती रहती तो इससे भ्रूण को गंभीर नुकसान हो सकता था। प्रसव के समय भी गंभीर और जानलेवा जटिलताएं पैदा होने की आशंका थी।

गर्भावस्था 22 सप्ताह से कम होने के कारण डॉक्टरों ने परिजनों को स्थिति की पूरी जानकारी दी। इसके बाद कानूनी प्रक्रिया के तहत गर्भावस्था को समाप्त किया गया। डॉक्टरों के अनुसार इस मामले में महिला की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए यह निर्णय लिया गया।

इस जटिल मामले की पहचान और उपचार में आईजीएमसी के रैडियोडायग्नोसिस विभागाध्यक्ष डॉ. अनुपम झोबटा, डॉ. श्रुति ठाकुर, डॉ. चारूस्मिता ठाकुर और स्त्री एवं प्रसूति रोग विभाग की डॉ. कल्पना नेगी की अहम भूमिका रही।

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हिन्दुस्थान समाचार / उज्जवल शर्मा

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