रंगमंच: संगीत नाटक अकादमी नई दिल्ली की प्रभावशाली प्रस्तुति नाटक पांचाली का मंचन

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रंगमंच: संगीत नाटक अकादमी नई दिल्ली की प्रभावशाली प्रस्तुति नाटक पांचाली का मंचन


रंगमंच: संगीत नाटक अकादमी नई दिल्ली की प्रभावशाली प्रस्तुति नाटक पांचाली का मंचन


मंडी, 10 जून (हि.स.)। संगीत नाटक अकादमी, नई दिल्ली द्वारा प्रस्तुत नाटक पांचाली का मंचन हिमाचल सांस्कृतिक शोध संस्थान एवं रंगमंडल परिसर, सतोहल मंडी में किया गया। इस प्रस्तुति का निर्देशन वर्ष 2022 के लिए संगीत नाटक अकादमी सम्मान से सम्मानित वरिष्ठ रंगकर्मी सुरेश शर्मा ने किया। नाटक को दर्शकों का भरपूर प्रेम मिला और प्रेक्षागृह पूर्णतः भरा रहा। पूरी प्रस्तुति के दौरान दर्शक मंत्रमुग्ध होकर नाटक से जुड़े रहे।

इस अवसर पर सरदार पटेल यूनिवर्सिटी की पूर्व प्रो. वीसी प्रो. अनुपमा सिंह बतौर मुख्यअतिथि और जिला भाषा अधिकारी रेवती सैनी विशिष्ट अतिथि मौजूद रही। वहीं पर वरिष्ठ साहित्यकार उपन्यासकार गंगाराम राजी, साहित्यकार मुरारी शर्मा, नगर निगम की नवनिर्वाचित पार्षद सरिता हांडा के अलावा कला एवं संस्कृति से जुड़े अनेक लोग मौजूद रहे। हिमाचल प्रदेश के रंगकर्म में सुप्रसिद्ध रंगकर्मी मनोहर सिंह के बाद सुरेश शर्मा ऐसे विशिष्ट रंगकर्मी हैं जिन्होंने हिमाचल प्रदेश के मंडी जिला को अपना रंगकर्म क्षेत्र बनाया। जिन्हें संगीत नाटक अकादमी का प्रतिष्ठित सम्मान प्राप्त हुआ है। उन्होंने अपने सृजनात्मक कार्यों और रंगमंचीय दृष्टि से प्रदेश के रंग आंदोलन को नई दिशा और पहचान प्रदान की है।

साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता नंदकिशोर आचार्य की लंबी कविता पांचाली पर आधारित यह नाट्य प्रस्तुति महाभारत की द्रौपदी के चरित्र को केंद्र में रखकर रची गई है। इसमें द्रौपदी केवल एक पौराणिक पात्र नहीं, बल्कि स्त्री अस्मिता, आत्मसम्मान, संघर्ष, प्रतिरोध और प्रश्नाकुल चेतना का प्रतीक बनकर उभरती है। प्रस्तुति में द्रौपदी के अंतर्मन, उसके अपमान, पीड़ा, आक्रोश और आत्मबल को अत्यंत संवेदनशीलता एवं कलात्मकता के साथ मंच पर साकार किया गया, जिसने दर्शकों को गहराई से प्रभावित किया।

कवि नंदकिशोर आचार्य ने “पांचाली” के माध्यम से सत्ता, युद्ध, पुरुषवादी व्यवस्था और नैतिक पतन जैसे प्रश्नों पर गंभीर चिंतन प्रस्तुत किया है। यह रचना केवल महाभारत की कथा का पुनर्पाठ नहीं है, बल्कि समकालीन समाज में स्त्री की स्थिति, उसके अधिकारों और उसकी गरिमा से जुड़े प्रश्नों की भी सशक्त अभिव्यक्ति है। उनकी काव्यात्मक, चिंतनशील और संवेदनात्मक भाषा इस कृति को विशेष ऊंचाई प्रदान करती है।

नाटक के सभी कलाकारों ने अपने-अपने पात्रों का प्रभावशाली और जीवंत अभिनय किया। संवादों की गहराई, सशक्त अभिनय, मंच-सज्जा, प्रकाश-परिकल्पना, संगीत तथा निर्देशन के उत्कृष्ट समन्वय ने प्रस्तुति को एक यादगार रंगानुभव में परिवर्तित कर दिया।

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हिन्दुस्थान समाचार / मुरारी शर्मा

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