ऐतिहासिक परंपराओं के साथ हुआ ममेेल-सोमाकोठी-महोग-सुकेत की बुढ़ी दिवाली का आयोजन

ऐतिहासिक परंपराओं के साथ हुआ ममेेल-सोमाकोठी-महोग-सुकेत की बुढ़ी दिवाली का आयोजन


मंडी, 24 नवंबर (हि.स.)। मंडी-सुकेत क्षेत्र में आयोजित बुढ़ी दिवाली की वैदिक और पौराणिक परंपरा रही है। मंडी जिला के करसोग उप-मंडल के तहत ममेल, सोमाकोठी, खन्योल, महोग, पोखी, चखाणा, स्यांज बगड़ा, थनाली, कनेरी आदि पंद्रह स्थानों पर 23 और 24 नवंबर को बुढ़ी दिवाली का पारंपरिक आयोजन किया गया। बुढ़ी दिवाली का आयोजन दिवाली के ठीक एक महीने बाद मार्गशीर्ष मास की अमावस्या को ही होता है।

हिमाचल प्रदेश में बुढ़ी दिवाली का आयोजन ब्यास, सतलुज व गिरि-पब्बर नदी घाटी में भी होता है। सुकेत संस्कृति साहित्य एवं जन कल्याण मंच पांगणा के अध्यक्ष डॉक्टर हिमेंद्र बाली का कहना है कि बुढ़ी दिवाली का आयोजन ऋग्वैदिक काल में घटित इंद्र और वृत्र के संघर्ष एवम् विरोचन पुत्र बलि व भगवान वामन की घटना से संबधित है। इस बुढ़ी दिवाली में जो अलाव जलता है उसको विरोचन पुत्र महादानी बलि का प्रतीक माना जाता है। यह अलाव उसकी यज्ञशाला मानी जाती है।

लोक साहित्य में इस अलाव को प्रज्जवलित करते हुए जो काव गीत गाए जाते हैं उसमें राजा बलि को वामन भगवान द्वारा तीन पग जमीन मांगे जाने पर पाताल लोक भेजने का वर्णन मिलता है। इस प्रकार बुढ़ी दीवाली वित्र और इंद्र के बीच के संघर्ष और उस परवर्ती काल में राजा बलि और भगवान वामन का अनूूठा प्रसंग है। बुढी दिवाली के आयोजन के साथ परशुराम द्वारा सतलुज घाटी में तपश्चर्या व शैव-शाक्त स्थलों की स्थापना से जुड़ा भी माना जाता है।

पुरातत्व चेतना संघ मंडी द्वारा स्वर्गीय चंद्रमणी कश्यप राज्य पुरातत्व चेतना पुरस्कार से सम्मानित डॉक्टर जगदीश शर्मा का कहना है कि करसोग के अंतर्गत ममेल में आयोजित बुढ़ी दिवाली का संबंध पौराणिक घटना सागर मंथन से और परशुराम के तप से भी माना जाता है। ममेल में रियासती काल में देवठी के लोग मूंज घास के बत्तीस हाथ बने नाग रूप बांड को पक्ष-प्रतिपक्ष बन कर खींचा करते थे। बुढ़ी दिवाली के अवसर पर प्रज्जवलित अलाव को राजा बलि का यज्ञ कुंड माना जाता है. राजा बलि से संबंधित काव गीत मुख्यत:गाए जाते हैं। हालांकि, काव गीतों में रामायण, महाभारत व सृष्टि का वर्णन भी मिलता है।

वास्तव में बुढ़ी दिवाली देवासुर संघर्ष एवम् नाग- खश संघर्ष का परिणाम है। सुकेत में ऐतिहासिक राजधानी पांगणा, कनेरी,रामगढ़ के स्यांज बगड़ा, चवासी गढ़ में खन्योल व महोग और सोमाकोटी,पोखी में बुढ़ी दिवाली का पारंपरिक रीति से जहां भी आयोजन किया गया वहां पर बहुत कम देवठियों में बांढ विधान परंपरा का निर्वहन किया गया। सोमेश्वर महादेव समिति सोमाकोठी के प्रधान देवी राम शर्मा, बुद्धि सिंह शर्मा का कहना है कि ठाकुर ठाणा क्षेत्र में बुढ़ी दीवाली की तैयारी मार्गशीर्ष अमावस्या से चार या आठ दिन पहले शुरु हो जाती है। मार्गशीर्ष अमावस्या को सांयकाल के बाद घर के आंगन में बने मांदले पर हरमुंजी लाल मिट्टी से लिपाई कर उस पर पठावे देवदार के पीले परागकणों से चौक पारम्परिक चित्रांकन लिख कर मांडले के मध्य गोबर के शंक्वाकार गणेश जी बनाकर इसके शीर्ष पर गेंदे का एक फूल स्थापित कर इसका पूजन किया जाता है। पूजन के बाद मांदले के सामने सूखी घास-फूस लकडिय़ां जलाकर दयाउड़ी करो दयाउडिय़ो के उद्घघोष किया जाता है। गणेश जी और अलाव को मोड़ी अंअर्पित कर मोड़ी भुनी गंदम,अखरोट की गीरी, गुड़ परिवार, पड़ोसियों व मेहमानों मे बांटकर बुढ़ी दीवाली की खुशी मनाई जाती है। भोजन से निवृत्त होकर सभी लोग हाथों में लकड़ी की मशालें लिए गांव की बड़ी दयाउड़ी मनाने के लिए सोमवलेश्वर महादेव की कोठी की ओर बढक़र रात भर सामुहिक दीवाली का आनंद लेते हैं।

महोग के समाजसेवी टी.सी.ठाकुर, प्रवक्ता अमर चंद शर्मा, अध्यापक मेहर सिंह राठौर, डॉक्टर होमेश शर्मा, नेक राम शर्मा नांज, प्रधानाचार्या सुरभि बाली, नयना शर्मा पोखी ,सुभाष पालेकर प्राकृतिक खेती की जिला सलाहकार लीना शर्मा का कहना है कि बुढ़ी दीवाली सुकेत की लोक संस्कृति की प्रेरणा की ऐसी धरोहर है। जिसमें यहां के जन जीवन के विश्वास, मूल भावना,धार्मिक और पौराणिक मान्यताओं, सामाजिक और ऐतिहासिक परंपराओं के दिग्दर्शन होते हैं।

हिन्दुस्थान समाचार/मुरारी

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