गांवों और जनजातीय क्षेत्रों तक पहुंचे राष्ट्रीय विमर्श, हर वर्ग की हो भागीदारी : प्रशांत पोल

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गांवों और जनजातीय क्षेत्रों तक पहुंचे राष्ट्रीय विमर्श, हर वर्ग की हो भागीदारी : प्रशांत पोल


शिमला, 30 अक्टूबर (हि.स.)। भारत की सांस्कृतिक और बौद्धिक परंपरा को मजबूत बनाने के लिए संवाद को शहरों और शिक्षित वर्ग तक सीमित रखने के बजाय गांवों, वनांचलों और जनजातीय क्षेत्रों तक पहुंचाने की जरूरत है। सार्थक संवाद में समाज के हर वर्ग की भागीदारी होनी चाहिए। प्रज्ञा प्रवाह के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख और लेखक प्रशांत पोल ने बिलासपुर जिले के घुमारवीं में आयोजित संगठन की हिमाचल प्रांत की पहली योजना समीक्षा बैठक में यह बात कही।

25 अक्टूबर को हुई इस बैठक में लेखकों, कवियों, बुद्धिजीवियों, शोधार्थियों, स्तंभकारों, वैज्ञानिकों, शिक्षकों और लोक कलाकारों के साथ संवाद करते हुए प्रशांत पोल ने कहा कि भारत का निर्माण सार्थक संवाद की परंपरा से हुआ है। भविष्य का भारत भी निरंतर, रचनात्मक, स्वस्थ और बहुआयामी संवाद से ही सशक्त बनेगा। उन्होंने कहा कि समाज में सार्थक संवाद को बढ़ावा देना केवल अधिकार नहीं, बल्कि कर्तव्य भी है।

प्रशांत पोल ने कहा कि प्राचीन भारतीय संवाद परंपरा को आधुनिक समय में फिर से स्थापित करने के उद्देश्य से लोकमंथन कार्यक्रम शुरू किया गया था। इसके पहले आयोजन का विषय 'उपनिवेशवाद से भारतीय मानस की मुक्ति' था। उन्होंने कहा कि लोकमंथन का उद्देश्य भारतीय ज्ञान परंपरा, लोकबुद्धि और सांस्कृतिक चेतना को एक साझा मंच पर लाना है। इस मंच के माध्यम से गांवों, देहात, वनांचलों और जनजातीय क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को भी राष्ट्रीय विमर्श में भागीदारी का अवसर देने का प्रयास किया जा रहा है।

उन्होंने भारतीय चिंतन में संवाद के उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए कहा कि इसका मकसद किसी को बहस में हराना नहीं, बल्कि स्वयं ज्ञान प्राप्त करना और दूसरों तक ज्ञान पहुंचाना है। उन्होंने इसे अंग्रेजी में 'नॉट टू डिबेट एंड विन, बट टू नो एंड लेट अदर्स नो' के विचार से समझाया। उनके अनुसार भारतीय संवाद संस्कृति का मूल भाव ज्ञान का आदान-प्रदान और सत्य की खोज है।

उन्होंने सार्थक संवाद के चार प्रमुख तत्व स्वस्थता, रचनात्मकता, निरंतरता और बहुआयामिता बताए। उन्होंने कहा कि स्वस्थ संवाद वह है जिसमें विवाद या जीत को प्राथमिकता देने के बजाय सत्य की खोज और विचारों के आदान-प्रदान पर ध्यान दिया जाए। टेलीविजन चैनलों और सार्वजनिक मंचों पर होने वाली कई बहसें भारतीय संवाद परंपरा के इस मूल भाव को व्यक्त नहीं करतीं।

बहुआयामी संवाद की व्याख्या करते हुए प्रशांत पोल ने कहा कि भारतीय संवाद केवल दो व्यक्तियों के बीच होने वाली चर्चा तक सीमित नहीं है। इसमें पूरा समाज, प्रकृति और सृष्टि के विभिन्न आयाम शामिल हैं। उन्होंने कहा कि भारत की सांस्कृतिक और बौद्धिक परंपरा के निर्माण में केवल नगरों में रहने वाले शिक्षित वर्ग का योगदान नहीं रहा है। वनवासी, ग्रामवासी और नगरों में रहने वाले नागरिकों ने मिलकर इस परंपरा को समृद्ध किया है। उन्होंने मध्यकालीन और औपनिवेशिक दौर में बाधित हुई संवाद परंपरा का उल्लेख करते हुए इसे फिर से व्यापक स्तर पर स्थापित करने की आवश्यकता जताई।

प्रशांत पोल ने हिमाचल प्रदेश के बुद्धिजीवियों, लेखकों, वैज्ञानिकों, शोधार्थियों और लोक कलाकारों से जयपुर में 4 से 6 दिसंबर तक होने वाले लोकमंथन कार्यक्रम में सक्रिय भागीदारी का आह्वान किया। इस बार लोकमंथन का विषय 'हम भारत के लोग' रखा गया है।

बैठक के दौरान प्रज्ञा प्रवाह हिमाचल प्रांत की कार्यकारिणी की घोषणा भी की गई। हेमांशु मिश्रा को प्रांत संयोजक, डॉ. राजेश शर्मा को प्रांत सह संयोजक और डॉ. अशोक तिवारी को प्रांत कोषाध्यक्ष बनाया गया है। अशोक टंडन को प्रांत कार्यालय प्रमुख की जिम्मेदारी दी गई है।

प्रांत कार्यकारिणी के सदस्यों में डॉ. जसपाल खत्री, डॉ. नीलम ठाकुर, भूदेव शर्मा, डॉ. अरुण कुमार सिंह, डॉ. विजय, डॉ. पी.एल. वर्मा, अजय बनियाल, तुषार पराशर और डॉ. मोहिनी अरोड़ा शामिल हैं।

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हिन्दुस्थान समाचार / उज्जवल शर्मा

Livevns.news Desk
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