शिमला के जाम से नहीं निकल पाई मोनोरेल, बागवान ने बगीचे में उतार दी पटरी

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शिमला के जाम से नहीं निकल पाई मोनोरेल, बागवान ने बगीचे में उतार दी पटरी


शिमला, 10 अक्टूबर (हि.स.)। शिमला शहर को ट्रैफिक जाम से राहत दिलाने के लिए सरकारें मोनोरेल चलाने की योजना को जमीन पर नहीं उतार पाईं, लेकिन शिमला जिले के ही कोटखाई में एक बागवान ने इसी तकनीक को अपने बगीचे की समस्या का समाधान बनाने की पहल की है। ढांगवी गांव के सुनील चौहान ने सेब की पेटियों को ढलानदार जमीन से स्टोर तक पहुंचाने के लिए मोनोरेल लगाई है। इसका सफल परीक्षण किया जा चुका है। अब उनकी तैयारी अगले सेब सीजन से इसके जरिये ढुलाई करने की है। सेब की फसल तैयार करने से लेकर उसकी पैकिंग तक मेहनत करने वाले बागवानों के लिए मजदूरों की कमी बड़ी चुनौती बन रही है। ऐसे में सुनील ने सेब की ढुलाई के लिए तकनीक का सहारा लिया है।

100 मीटर की पटरी पर एक बार में 500 किलो सेब

सुनील चौहान ने अपने बगीचे में 100 मीटर लंबा मोनोरेल ट्रैक तैयार करवाया है। इसमें नौ हॉर्स पावर का इंजन लगाया गया है। सुनील के मुताबिक मोनोरेल एक बार में करीब 500 किलो सेब ले जाने में सक्षम है। उनके अनुसार यह 45 डिग्री तक की ढलान पर भी काम कर सकती है। इससे उन बगीचों में पेटियां पहुंचाना आसान होने की उम्मीद है, जहां खड़ी ढलान के कारण सड़क बनाना मुश्किल होता है और मजदूरों को सेब उठाकर ले जाना पड़ता है।

इस व्यवस्था के लिए इंजन और ट्रैक चीन के ग्वांगझोउ से मंगवाए गए थे। सामान जून में पहुंच गया था, लेकिन सेब सीजन के काम में व्यस्त रहने के कारण उस समय इसे स्थापित नहीं किया जा सका। बाद में ट्रैक तैयार कर इसका परीक्षण किया गया। पूरी व्यवस्था पर करीब 4.20 लाख रुपये खर्च हुए हैं। इसमें सरकार की ओर से 50 हजार रुपये की सब्सिडी भी मिली है।

मजदूरों की कमी ने दिखाई तकनीक की राह

सुनील चौहान के बगीचे में लंबे समय से दो परिवार काम कर रहे थे। उनके मुताबिक, इनमें से एक परिवार काम छोड़कर जा चुका है, जबकि दूसरा भी जाने की बात कह रहा है। ऐसे में उन्हें चिंता थी कि सेब सीजन में मजदूरों की कमी के बीच फसल की ढुलाई कैसे होगी। इसी समस्या के समाधान के लिए उन्होंने मोनोरेल लगाने का निर्णय लिया।

फिलहाल एक बगीचे में इसे लगाया गया है। परीक्षण सफल रहने के बाद अब दूसरे बगीचे में भी मोनोरेल लगाने की योजना है। सुनील के पास सेब के तीन बगीचे हैं और उनके अनुसार इनमें हर साल करीब 4,000 से 4,500 पेटी सेब का उत्पादन होता है।

सघन बागवानी और नई किस्मों पर भी जोर

सुनील चौहान सघन बागवानी यानी हाई डेंसिटी प्लांटेशन तकनीक से भी सेब उगा रहे हैं। उन्होंने पुराने बगीचे में टॉप ग्राफ्टिंग के जरिये नई किस्में तैयार की हैं। अब उनका जोर बगीचे से स्टोर तक सेब पहुंचाने में लगने वाली मेहनत कम करने पर है। पहाड़ी ढलानों पर स्थित बगीचों में मोनोरेल कितनी उपयोगी साबित होगी, इसका आकलन नियमित ढुलाई शुरू होने के बाद हो सकेगा।

शिमला के जाम के लिए भी सामने आया था मोनोरेल का प्रस्ताव

शिमला शहर में ट्रैफिक जाम से राहत दिलाने के लिए पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के कार्यकाल में भी मोनोरेल परियोजना लाने की कवायद हुई थी। इस संबंध में विदेश की एक कंपनी ने प्रस्तुति दी थी, लेकिन यह पहल आगे नहीं बढ़ सकी। शहर में यातायात की समस्या के समाधान के लिए जिस परियोजना को जमीन पर नहीं उतारा जा सका, उसी तरह की तकनीक का इस्तेमाल अब कोटखाई का एक बागवान अपने सेब बगीचे में ढुलाई आसान बनाने के लिए कर रहा है।

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हिन्दुस्थान समाचार / उज्जवल शर्मा

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