शिमला में सफाई कर्मचारियों की हड़ताल पर निगम प्रशासन सख्त, छह माह के लिए एस्मा लगाने की तैयारी

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शिमला, 14 मई (हि.स.)। शिमला नगर निगम में सफाई व्यवस्था को लेकर टकराव अब खुलकर सामने आ गया है। शहर की सफाई व्यवस्था संभालने वाले सैहब कर्मियों ने 15 मई से अनिश्चितकालीन हड़ताल पर जाने का ऐलान किया है, वहीं नगर निगम प्रशासन ने इस पर सख्त रुख अपनाते हुए आवश्यक सेवा अनुरक्षण अधिनियम यानी एस्मा लगाने की तैयारी कर ली है। निगम प्रशासन का कहना है कि शहर की सफाई व्यवस्था आवश्यक सेवाओं में शामिल है और इसे बाधित नहीं होने दिया जाएगा।

नगर निगम शिमला के कमिश्नर भूपेंद्र अत्री ने गुरूवार को बताया कि नगर निगम में 677 सैहब कर्मी कार्यरत हैं और सफाई व्यवस्था जैसी आवश्यक सेवा को हड़ताल के जरिए प्रभावित करना उचित नहीं है। उन्होंने कहा कि इस मामले में अदालत भी पहले निर्देश दे चुकी है। वर्ष 2017 में भी सफाई कर्मियों की हड़ताल हुई थी, जिस पर कोर्ट ने सख्त टिप्पणी की थी। कमिश्नर ने कहा कि आवश्यक सेवाओं को बाधित करने वालों के खिलाफ एस्मा लगाया जाएगा और जिला दंडाधिकारी व उपायुक्त इसके आदेश जारी करेंगे। उन्होंने कहा कि हड़ताल पर जाने वाले कर्मचारियों पर छह महीने तक के लिए एस्मा लागू किया जाएगा।

भूपेंद्र अत्री ने कहा कि सफाई कर्मचारियों की बीमा सहित कई जायज मांगों को निगम प्रशासन पहले ही मान चुका है। इसके बावजूद कर्मचारियों का हड़ताल पर जाना तर्कसंगत नहीं है। उन्होंने माना कि हड़ताल की वजह से शहरवासियों को कुछ परेशानी हो सकती है, लेकिन निगम प्रशासन ने इससे निपटने के लिए वैकल्पिक व्यवस्था तैयार कर ली है। उन्होंने कहा कि आउटसोर्स पर सेवाएं दे रहे कर्मचारियों से काम लिया जाएगा और जरूरत पड़ने पर ठेकेदारों के माध्यम से सफाई कर्मचारियों की भर्ती के लिए टेंडर भी निकाले जाएंगे।

कमिश्नर ने बताया कि हड़ताल का सबसे ज्यादा असर डोर टू डोर गार्बेज कलेक्शन पर पड़ सकता है। उन्होंने शहरवासियों से अपील की कि वे कूड़े को खुद गार्बेज कलेक्शन सेंटर तक पहुंचाएं ताकि सफाई व्यवस्था पूरी तरह प्रभावित न हो।

उधर सीटू से संबंधित सैहब सोसाइटी यूनियन ने नगर निगम प्रशासन पर मजदूर विरोधी रवैया अपनाने का आरोप लगाया है। यूनियन का कहना है कि नगर निगम ने कर्मचारियों की 10 प्रतिशत वार्षिक वेतन वृद्धि बंद कर दी है और उसकी जगह केवल 3 प्रतिशत महंगाई भत्ता देने की घोषणा की है। सीटू प्रदेशाध्यक्ष विजेंद्र मेहरा का कहना है कि इससे कर्मचारियों को हर महीने 700 से 1000 रुपये तक का नुकसान होगा।

यूनियन नेताओं ने आरोप लगाया कि शहर में पानी, कूड़ा शुल्क और प्रॉपर्टी टैक्स लगातार बढ़ाए जा रहे हैं, लेकिन सफाई कर्मचारियों की सुविधाओं में कोई सुधार नहीं किया गया। उनका कहना है कि पहले एक कर्मचारी के जिम्मे करीब 80 घर होते थे, जबकि अब यह संख्या बढ़कर लगभग 300 तक पहुंच गई है। इसके बावजूद कर्मचारियों को न तो ओवरटाइम का भुगतान मिल रहा है और न ही कानूनी छुट्टियां।

यूनियन ने नगर निगम पर फिजूलखर्ची के आरोप भी लगाए हैं। नेताओं का कहना है कि क्यूआर कोड योजना पर करोड़ों रुपये खर्च किए गए, जबकि उसी राशि से नए कर्मचारियों की भर्ती कर मौजूदा कर्मचारियों का काम का बोझ कम किया जा सकता था। यूनियन ने साफ किया है कि यदि उनकी मांगें नहीं मानी गईं तो 15 मई से शुरू होने वाली हड़ताल जारी रहेगी, जिसका असर शिमला शहर की सफाई व्यवस्था पर पड़ सकता है।

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हिन्दुस्थान समाचार / उज्जवल शर्मा

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